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दो भारतीय ऑस्ट्रेलियाई भाईयों ने लेमोनेड बेच कर जमा की बुशफायर से प्रभावित जानवरों के लिए रक़म

Source: Supplied

क्रिसमस की छुट्टियों में जब 10 साल के सायरस गिल और 7 साल के नोआह गिल अपने माता पिता के साथ विक्टोरिया के रीजनल इलाके में गए तो आग की वजह से प्रभावित क़्वाला और कंगारुओं की कहानियों ने उनको कई मुश्किल सवालों से दो चार किया।

ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की सबसे भयानक बुशफायर (जंगल की आग) के कारण करोड़ों जानवरों की जान गई और लाखों को अब देखभाल की जरुरत है। 

धुंए और गर्मी की वजह से जानवरों के खतरें में होने की बात सुनकर दोनों भाइयों ने ठाना की वो वाइल्ड लाइफ की मदद करने के लिए काम करेंगें।

लेकिन बड़ा सवाल ये कि किया क्या जाए। 

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उनके पिता सनी गिल कहते हैं कि छुट्टियों से लौटते समय कार में ये डिस्कशन होता रहा की हमारे पास क्या ऑप्शंस हैं।

काफी सोचने के बाद बच्चों ने तय किया कि क्यों ना 26 जनवरी ऑस्ट्रेलिया डे और भारत के गणतंत्र दिवस के मौके पर अपनी स्ट्रीट पर फण्ड रेजिंग की जाए।

साइरस ने अपने भाई को उसके फेवरेट खिलौनो को सेल पर लगाने के लिए राज़ी किया। 

उन्होंने एसबीएस हिंदी से कहा, “अगर हम अपना फेवरेट खिलौना नहीं दे सकते तो इसका मतलब हम अपने मक़सद के लिए ईमानदार नहीं हैं।”

दो भारतीय ऑस्ट्रेलियाई भाइयों ने लेमोनेड बेच कर जमा की बुशफायर से प्रभावित जानवरों के लिए रक़म
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सनी गिल बताते है कि नोआह और साइरस दोनों को आर्टइफेक्ट बनाने का शौक है, इसीलिए उन्होंने पूरा दिन लगा कर पत्थरों को इक्कठा कर उन्हें कलर किया, नैकलेस बनायें।

इन सब तैयारिओं के बाद माँ रज़िया गिल ने उनकी मार्केटिंग में मदद की।

न सिर्फ सोशल मीडिया पर उन्होंने लोगों से इस कोशिश का समर्थन करने की अपील की, बल्कि अपनी स्ट्रीट के आस पास पोस्टर भी लगा दिए।

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रज़िया बताती हैं की वे ऑस्ट्रेलिया में आयें रिफ्यूजी समुदाय के साथ काम करतीं हैं और अपने बच्चों को दूसरों की मदद के लिए प्रेरित करती हैं। 

“उस दिन गर्मी बहुत थी इसलिए हमने करीब 5-6 बड़े जग लेमोनेड बना दिया, हमें उम्मीद थी कि बच्चों के आर्टवर्क के साथ एक गिलास ठंडा लेमोनेड खूब बिकेगा।”  

26 जनवरी की सुबह 10 बजे पूरा परिवार अपने घर के सामने टेबल लगा कर सारा सामान ले कर जमा हो गया।

सनी बताते हैं कि लगातार 5 घण्टे तक लगातार अपनी मेकशिफ्ट दुकान से दोनों बच्चों ने 217 डॉलर इक्कठा किये।

इस रकम को दोनों जानवरों की देखभाल के लिए लगाना कहते थे इसलिए सनी गिल उन्हें लेकर ज़ू विक्टोरिया के दफ्तर गए और ये रकम वहां डोनेट कर दी।

 

अच्छा काम करने का नतीज़ा हमेशा अच्छा होता है और ये ही साइरस और नोआह के साथ भी हुआ। 

ज़ू विक्टोरिया की सीईओ जेनी ग्रे ने उन्हें पत्र लिख कर इस कोशिश के लिए धन्यवाद किया। 

दो भारतीय ऑस्ट्रेलियाई भाइयों ने लेमोनेड बेच कर जमा की बुशफायर से प्रभावित जानवरों के लिए रक़म
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उन्होंने ये भी वायदा किया कि ये रकम किन जानवरों की देखभाल के लिए खर्च होगी इस के बारे में वो पूरी जानकारी बच्चों को भेजेंगी।  

साइरस कहते हैं इस अनुभव से उनका अपने आप पर ना केवल भरोसा बढ़ गया है बल्कि ये भी समझ आया कि निस्वार्थ भाव से काम करने पर कितनी ख़ुशी मिलती है। 

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