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मुश्किलों को टक्कर देकर सफलता की सीढ़ी चढ़ने वाली भारतीय ऑस्ट्रेलियाई “बिल्डर गीतांजली” की कहानी

Source: Supplied

14 साल की गीतांजली साल 2003 में जब भारत से मेलबोर्न अपने परिवार के साथ पहुंची तो उन्हें बिलकुल नहीं पता था कि आने वाला वक्त उनकी कितनी परीक्षा लेगा।

मुझे साल 2003 की वो शाम आज तक याद है जब मैं अपने माता पिता के साथ मेलबोर्न पहुँची थी। नया शहर, नया देश मेरे सपनों को नयी उड़ान देने के लिए काफी था। 

मुझे याद हैं कि मैं बहुत छोटी सी थी और सुपर स्टोर से आये गत्ते के डिब्बों को जोड़कर घर बनाती थी। माँ अकसर कहती, बेटा अभी अपना घर बनाने के लिए तुझे बहुत पढ़ाई करनी है।

 

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तब मुझे कहाँ पता था कि माँ का कहा सच हो जायेगा।

बहुत से दूसरे माइग्रेंट बच्चों की तरह मैं भी कन्फ्यूज्ड थी क्या कोर्स करूँ की जीवन में सफल हो सकूँ।

खैर मैंने कॉमर्स डिग्री करने का फैसला किया।  

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इस दौरान कभी टारगेट, आईजीआई और ड्राई क्लीनर की दुकान पर काम कर घर की जिम्मेदारी में हाथ बटाती रही। डिग्री पूरी होने पर विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के फाइनेंस डिपार्टमेंट में नौकरी भी मिल गयी। 

फिर भी मन नहीं लग रहा था, मैंने एक ऑनलाइन प्रोडक्ट बेचने वाली कम्पनी में पार्ट-टाइम वीकेंड जॉब ले लिया। 

इस काम से मैंने बहुत कमाया तो नहीं लेकिन इसने मेरी नई ज़िंदगी की नींव रख दी। 

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यहाँ मेरी मुलाकात अनुज मेहता से हुई जो कम्पनी के सेमिनार को अटेंड करने आये थे, दरअसल हमें मेंबर बनाने पर कमीशन मिलता था। मुझे लगा कि मैं उन्हें मेंबर बना कर कुछ एक्स्ट्रा कमा लूंगी। 

लेकिन बार-बार मुलाक़ात के बाद अनुज और मैं एक दूसरे को पसंद करने लगे। वो उस वक़्त इंटरनेशनल स्टूडेंट था, मैं अक्सर उससे कहती कि मैं कुछ और कुछ अलग करना चाहती हूँ। 

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उसने मुझे बताया की नर्सिंग अच्छा प्रोफेशन है और वेतन भी बहुत अच्छा मिलता है, बहुत सोच विचार के बाद मैंने नर्सिंग की डिग्री में एडमिशन ले लिया। 

तीन साल के कोर्स में ढाई साल पढ़ाई के बाद मुझे समझ आया कि ये वो काम नहीं जो मैं करना चाहती हूँ, ऐसा लगता था कि कुछ तो मिसिंग है। 

मैंने अनुज के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार करने के साथ ही नर्सिंग छोड़ने का फैसला भी किया। 

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अब सवाल ये की आखिर मैं करूँ क्या। 

अनुज उस वक़्त एक बिल्डर के यहाँ सेल्स एग्जीक्यूटिव के तौर पर काम करते थे। मैंने उससे कहा मुझे भी कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में काम करना है। वो बोला ठीक है मैं अपने बॉस से बात कर तुम्हें भी सेल्स टीम में लेने की गुज़ारिश करूँगा। 

ये मुझे मंज़ूर नहीं था मैं तो साइट पर काम करना चाहती थी। 

बड़ी कोशिशों के बाद अनुज के बिल्डर ने मुझे एडमिन स्टाफ़ के साथ साइट सुपरवाइजर की जिम्मेदारी देने पर हाँ कर दी। 

इसमें मेरा काम ट्रेड के कारीगरों को मैनेज करना होता था। एक बात मैं हमेशा कहूँगी कि उन्होने मुझे सब कुछ सिखाया।

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बहुत सी सेल्स की लड़कियाँ मुझसे कहती थी तुम कैसे ट्रेडी को मैनेज करती हो तो मेरा सिर्फ इतना कहना था यदि आपको अपना काम ठीक से आता है तो कुछ मुश्किल नहीं है। 

करीब दो साल उस बिल्डर के यहाँ दोनों पति पत्नी ने मेहनत से काम सीखा और ज़िंदगी के नए अध्याय को लिखने की ठानी। लेकिन मुश्किल ये कि विक्टोरिया में सिर्फ लाइसेंस वाले लोग ही घर बना सकते हैं।  

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इसका रास्ता भी हमने निकाल लिया और मेलबोर्न के एक कॉलेज में पढ़ाने वाले बिल्डर लाइसेंस धारक व्यक्ति को अपना गुरु बना लिया। 

वो ऐसे ही नहीं माने उन्होंने मेरी पूरी परीक्षा ली उन घरों को आ कर देखा जिन्हे मैं सुपरवाइज़ कर रही थी, तब कही जा कर वो हमारे साथ काम करने को राज़ी हुए। 

इस तरह पांच साल पहले मैंने “पनाश डिज़ाइनर होम्स” नाम से कम्पनी शुरू कर दी।

जैसा मेरे साथ हमेशा होता हैं मुश्किलों ने यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा। लेकिन इस बार मुझे पता था की ये ही मेरा सपना है। मैंने ठान लिया था कि कुछ भी हो जाए रुकना नहीं है। 

पहले साल में हमने ४ घर बनाए, दूसरे साल में भी 4 ही घर बनाए। शुरुवात में सावधानी के बाद आज पांच साल बाद मैं हर साल २५ से ज्यादा घर बनाती हूँ।

अनुज कहते हैं… 

मुझे बहुत अच्छा लगता है, मैं बहुत प्राउड फील करता हूँ। जब हमने काम शुरू किया था तब किसी को विश्वास नहीं होता था कि गीतांजली घर बनती है। उन्हें लगता था कि मैं घर बनाता हूँ और वो बेचती है। जबकि है इसका बिलकुल उल्टा। 

 

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लेकिन एक चीज़ अभी भी रह गयी थी, वो ये की मेरे पास अच्छा काम करने के अनुभव के बावजूद अपना बिल्डर लाइसेंस नहीं था। 

इसीलिए मैंने दो साल पहले बिल्डिंग एंड कंस्ट्रक्शन में सर्टिफ़िकेट 4 एडमिशन ले लिया। क्लास में मेरे अलावा सब लड़के थे। उन्हें लगता था मैं एडमिन में काम करती हूँ और उसी की ज्यादा जानकारी के लिए कोर्स कर रही हूँ। 

लेकिन जब मैंने उन्हें बताया की मैं एक्चुअल कंस्ट्रक्शन कराती हूँ तो वो मेरा काम देखने साइट तक आए। 

कोर्स पूरा कर मैंने लिखित परीक्षा पास की, और तीन घण्टे की मुश्किल इंटरव्यू की प्रक्रिया से गुजरने के बाद साल 2020 की शुरुवात बिल्डर लाइसेंस मिलने की खबर के साथ हुई।

आज मैं विक्टोरिया की दूसरी भारतीय मूल की लाइसेंस-धारक बिल्डर हूँ। 

मैं आप सब महिलाओं से एक ही बात कहना चाहती हूँ…. 

“अपने सपनों की उड़ान को कभी बांधना मत।”

मेरी कहानी सुनकर अगर एक भी लड़की अपने सपनों का पीछा करने की ठान लेगी तो मेरे लिए उससे बड़ी बात कुछ नहीं होगी।

 


विशेष:8th मार्च, अंतर्राष्टीय महिला दिवस के लिए हमारी ख़ास पेशकश की ये पहली कहानी है। यदि आप के पास भी ऐसी ही कोई कहानी है तो हमसे jitarth.bharadwaj@sbs.com.au  पर संपर्क करें।   

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