आज हम आपको ऐसी ही कुछ महिलाओं से मिलवा रहे हैं जो अपने करियर में एक मुकाम पा चुकीं थी या फिर और भी अच्छे मुकाम के रास्ते पर आगे बढ़ चुकीं थीं लेकिन फिर उन्होंने लिया एक बढ़ा फैसला. उन्होंने अपनी जॉब छोड़ने का या फिर अपने करियर को बदलने का फैसला लिया. पता हैं क्यों? क्योंकि उनको अहसास हुआ मुकाम का जहां उनको किसी ओहदे की जगह मां के नाम से पुकारा जाता है.
सिडनी में रहने वाली वर्षा ठाकुर सांकला एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और भारत, अमेरिका के बाद ऑस्ट्रेलिया में भी सर्विस नाव जैसी कुछ बेहतरीन आईटी कंपनियों में काम कर चुकी हैं. उनका अनुभव उनका काम उन्हें और ऊंचे मुकाम पर ले जा सकता था लेकिन करीब एक साल पहले उन्होंने एक फैसला लिया कि वो नौकरी छोड़ देंगी और ज्यादा से ज्यादा समय बच्चों को देंगी.

ऐसा ही सोचने वाली एक और महिला चरन आहूजा कैनन ऑस्ट्रेलिया में अकाउंट एडमिनिस्ट्रेटर थीं.. कंपनी काम सबकुछ अच्छा चल रहा था.. करीब 9 साल पहले जब वो मैटरनिटी लीव पर गईं तो फिर उन्होंने दोबारा काम पर नहीं लौटने की ठानी. उनका कहना है कि.
"घर पर तब केवल मैं और मेरे पति थे. हमने तब फैसला किया कि मैं बच्चों को समय दूंगी साढ़े तीन साल बाद दूसरा बच्चा भी दुनिया में आया तो सोचा कि इसके साथ कैसे भेदभाव किया जा सकता है इसलिए उसे समय देने के लिए भी घर पर ही रही"
अब मिलिए अनीता से वो जब भारत से यहां आई थीं तो हर किसी प्रवासी की तरह उनके सामने परिवार को आर्थिक तौर पर मदद करने की चुनौती थी. और इसके लिए उन्होंने चाइल्ड केयर का कोर्स किया. अच्छी बात ये थी कि उन्हें नौकरी भी मिल गई और इस काम में वो अपने बच्चे की देखभाल भी कर पा रही थीं. लेकिन इस बार उनका बच्चा स्कूल जाने लगा है. बस मां का दिल नहीं माना और उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

अब हमने जानना चाहा कि क्या नौकरी छोड़ने पर इन माओं को इस बात का ख्याल नहीं आया कि करियर छोड़ना या बदलना इनके लिए अच्छा नहीं भी हो सकता है या फिर अगर वो अभी बच्चों के साथ कुछ समझौता करती हैं तो करियर में वो काफी आगे जा सकती हैं. इस बारे में वर्षा कहती हैं.
"सच कहूं तो बिल्कुल भी ऐसा खयाल नहीं आया, क्योंकि उस वक्त हमारी प्राथमिकता हमारे बच्चे थे. मैने सोचा कि नौकरी तो फिर कभी भी की जा सकती है लेकिन बच्चों का ये मासूम बचपन वापस नहीं आएगा."
चरन भी कहती हैं उन्हें इस बात का पछतावा तो नहीं है कि उन्होंने बच्चों के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी लेकिन वो मानती हैं कि अब दोबारा शुरूआत के लिए उन्हें एक नई ऊर्जा चाहिए होगी क्योंकि उन्हें नौकरी छोड़े काफी वक्त हो गया है.

अनिता कहती हैं कि उनकी नौकरी जाने पर उन्हें आर्थिक तौर पर थोड़ा फर्क तो पड़ा लेकिन ये परेशानियां बच्चों की खुशी से बड़ी नहीं हैं. वो कहती हैं.
"थोड़ा बहुत फर्क पड़ा लेकिन मैनेज हो जाता है, अब बच्चे की चाइल्ड केयर की फीस भी तो नहीं जाती. लेकिन जब बच्चे को मेरी सबसे ज्यादा ज़रूरत है उस वक्त मैं उसके पास रहना चाहती हूं."
अब हमने जानना चाहा कि इन माओं को अपने बच्चों को समय देते हुए किस तरह की संतुष्टि होती है चरन कहती हैं कि वो बच्चों को समय देती थी और उन्हें इस बीच दूसरी माओं को समझने का भी मौका मिला. वर्षा कहती हैं कि वो अब अपने बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिता पा रही हैं.
अनीता को इंतज़ार है कि उनके बच्चे का मन स्कूल में ठीक तरह से लग जाए. तो फिर वो कोशिश कर सकती हैं कि उन्हें सुबह की शिफ्ट मिल जाए. और वो फिर से अपने परिवार को आर्थिक तौर पर मदद कर पाएं.
वर्षा भी एक गणित का एक एजुकेशनल सेंटर चलाती हैं और वो मानती हैं कि इस तरह से वो कुछ काम भी कर पा रही हैं और बच्चों को उनका कीमती वक्त भी दे पा रही हैं. वहीं चरन भी अब अपने पति के व्यवसाय में हाथ बंटा देती हैं.
