सबसे पहले आपको रूबरू कराते हैं कुछ ऐसे प्रवासी भारतीय मतदाताओं से जो भारत में हो रहे चुनावों को लेकर ख़ासे उत्साहित हैं. मिलिए गजेंद्र कोठवाड़े से जिन्होंने ख़ास तौर पर भारत जाकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए छुट्टी प्लान की है.

गजेंद्र सिडनी में सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते हैं और भारत में वो पुणे के रहने वाले हैं और चूंकि वहां 23 अप्रैल को तीसरे चरण का मतदान है इसलिए उन्होंने इसके आस पास ही अपनी छुट्टी प्लान की है. ये ही नहीं वो पूरी तैयारी करके ही यहां से गए हैं उन्होंने खुद को एक एनआरआई वोटर के तौर पर रजिस्टर भी करवाया है और साथ ही उन्होने अपने परिवार के लोगों से सुनिश्चित किया है कि उनका नाम उनके गृह नगर में दर्ज है या नहीं. ज़ाहिर है इसके पीछे उनका मक़सद अपने वोट तो सुनिश्चित करना था.
जोश तो शैलेश मुंगरुलकर का भी कम नहीं है लेकिन उन्हें अफसोस है कि काम की व्यस्तता के चलते वो अपनी पसंदीदा पार्टी या उम्मीदवार को वोट नहीं दे पाएंगे. शैलेश कहते हैं कि अगर कोई रास्ता निकल पाता तो अच्छा होता. वो बताते हैं.

"मैने सोशल मीडिया पर खबर देखी थी कि एनआरआई इस बार ऑन लाइन वोट दे सकते हैं लेकिन बाद में पता चला कि ये ख़बर ग़लत थी. काश कि ऐसा हो पाता".
ज़ाहिर है भारत से बाहर रहने वाले प्रवासियों के इस उत्साह के अपने मायने हैं. लेकिन विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनाव में ये जोश कितना अहम किरदार निभाता है. या फिर कहें कि इस जोश के कितने मायने हैं इस पर हमने बात की दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार इकबाल अहमद से. इकबाल कहते हैं कि हालांकि पहले प्रवासी भारतीयों का चुनावों में बहुत योगदान नहीं होता था. लेकिन वो मानते हैं कि आम आदमी पार्टी के अस्तित्व में आने के बाद पहली बार एक बड़ी तादाद में प्रवासी भारतीय दिल्ली के चुनावों में सक्रिय दिखे. कई प्रवासी सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी के प्रचार में सहयोग कर रहे थे. ये ही नहीं कई लोग तो छुट्टी लेकर चुनावों में उनकी मदद के लिए भारत आए और उन्होंने पार्टी के लिए काफी काम भी किया.
ऐसा ही कुछ इक़बाल साल 2014 के आम चुनावों के बारे में भी पाते हैं. वो कहते हैं कि बीजेपी एक बहुत बड़ी पार्टी है ऐसे में विदेशों में भी इस पार्टी के समर्थकों की संख्या लाखों में है. ज़ाहिर तौर पर प्रवासी भारतीयों ने 2014 के चुनावों में बीजेपी के लिए काफी काम किया और आर्थिक मदद भी की. प्रवासी बीजेपी समर्थकों से कुछ ऐसा ही समर्थन वो इस बार भी देख रहे हैं.
हालांकि इक़बाल ये भी कहते हैं कि ये समर्थन चुनावों के नतीजे को सीधे-सीधे प्रभावित करने से कही ज्यादा सांकेतिक ही है. वो कहते हैं.
"भारत में करीब 900 मिलियन मतदाता हैं, ऐसे में किसी भी पार्टी के समर्थक कुछ लाख प्रवासी भारतीय चुनावों की सीधे प्रभावित नहीं कर सकते. उनके भारत में चुनाव को लेकर उत्साह और कई लोगों के मतदान के लिए भारत आने की घटना को ऐसे देखा जा सकता है कि लोकतंत्र में लोगों का बहुत ज्यादा विश्वास है"
