एक मां की जीत है विक्टोरिया-चैंपियन शार्लीन का गोल्ड

भारतीय मूल की शार्लीन शैरन ऑस्ट्रेलिया के कराटे जगत में तेजी से उभरता सितारा हैं. 10 साल की शार्लीन नैशनल चैंपियनशिप की तैयारी कर रही हैं.

sharleen Saron

Source: Supplied

क्वीन्सलैंड स्टेट कराटे चैंपियनशिप में अलग-अलग प्रतियोगिताओं में गोल्ड और ब्रॉन्ज जीतने वालीं शैरन अब अगस्त में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में हिस्सा लेंगी. वह बताती हैं कि कराटे न सिर्फ उन्हें पसंद है बल्कि वह इसे अपने करियर के रूप में भी देखती हैं. शार्लीन कहती हैं, "मेरा सपना है कि एक दिन मैं ओलंपिक में जाऊं."

इस सपने की शुरुआत बहुत छोटी और भावुक थी. जब वह 7 साल की थीं और दूसे ग्रेड में थीं तभी से कराटे सीखने लगी थीं. उनकी मां मशिका मालिनी चाहती थीं कि उनकी बेटी आत्मरक्षा में निपुण हों ताकि वह हर तरह की मुसीबत से निपट सकें. मशिका बताती हैं, "मुझे लगता है कि हर बच्चे को सेल्फ डिफेंस आनी चाहिए. खासतौर पर लड़कियों को क्योंकि घरेलू हिंसा है और सड़कें भी उतनी सुरक्षित नहीं हैं. तो जैसे तैराकी आपकी जान बचा सकती है, वैसे ही कराटे भी."

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शार्लीन अब राष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए खूब मेहनत कर रही हैं लेकिन इस मेहनत में उन्हें खूब मजा भी आता है. वह कहती हैं, "ट्रेनिंग करना पसंद है. वह कहती मैं ट्रेनिंग को पसंद करती हूं क्योंकि इसमें बहुत मजा आता है." 9 साल की उम्र में उन्होंने ब्लैक बेल्ट हासिल कर लिया था. मशिका बताती हैं कि शार्लीन के लिए शुरुआत जरा भी मुश्किल नहीं रहीं. वह याद करती हैं, "जब वह पहले दिन गई वहां पर और उसने किक किया तो सामने वाला गिर गया. तब शार्लीन को बहुत मजा आया. फिर तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद उसने पहले कॉम्पटिशन में ही गोल्ड जीता." उसके बाद शार्लीन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

लेकिन शार्लीन की जिंदगी कराटे तक ही नहीं सिमटी है. वह स्काईडाइविंग भी कर चुकी हैं. स्काईडाइविंग आमतौर पर 12 साल के बाद ही करवाई जाती है लेकिन शार्लीन की बहादुरी के आगे मुसीबतें पस्त हो जाती हैं. ऑस्ट्रेलियन पैराशूट फेडरेशन ने शार्लीन को विशेष इजाजत दी.

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शार्लीन की मां मशिका अपने सपनों को पूरा होते देख रही हैं, तो गर्व से भर जाती हैं. वह कहती हैं, "मैं फिजी से हूं जो एक छोटा आईलैंड है. वहां इतने मौके नहीं हैं. और लड़कियों को तो बिल्कुल नहीं हैं. लड़कों को मौके मिलते हैं लेकिन लड़कियों को स्विमिंग भी नहीं सिखाते. बोलते हैं कि स्विमिंग सूट मत पहनो. डीसेंट नहीं है. दादियां बोलती हैं कि लड़कियों का काम है खाना पकाना, तो घर पर रहो."

इसलिए शार्लीन जब जीतती हैं तो दरअसल यह मशिका के संघर्ष की जीत होती है, उस संघर्ष की जो एक लड़की बचपन से करती है.

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By vivek asri

Source: SBS Hindi


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