भारतीयों का महत्वपूर्ण त्यौहार है दीवाली। बहुत सारी मान्यताएं हैं दीपवली के जगमगाते दीयों के पीछे, चाहे वो भगवान राम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी हो, माता लक्ष्मी की आराधना हो या फिर जीवन में मंगल की कामना। लेकिन भारत के बाहर ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में ये त्यौहार और महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब हम इनके ज़रिए अपनी सांस्कृतिक विरासत अपने बच्चों तक पहुंचा रहे होते हैं ऐसा ही एक आयोजन हुआ सिडनी के हैरिस पार्क में जिसके आयोजक थे काउंसिल ऑफ इंडियन ऑस्ट्रेलियंस।

जब हमने बच्चों से जानने चाहा कि क्या वो भी जानते हैं कि आखिर दीवाली मनाई क्यों जाती है तो हमने पाया कि इन बच्चों को असत्य पर सत्य की विजय जैसी गहरी बातें तो नहीं पता लेकिन राम और रावण की स्टोरी में इन्हें भी इंटेरेस्ट है। यहां मौजूद अभिभावकों के मुताबिक ऐसा आयोजन उन्हें मौका देते हैं जबकि वो बच्चों को भारतीय संस्कृति से रूबरू करा सकें।

हालांकि कुछ अभिभावकों का ये भी मानना था कि बच्चों से भारी-भरकम बातें करने के बजाए इस उम्र में उन्हें बस दीवाली पर होने वाला मस्ती ही करने देना चाहिए। उधर कार्यक्रम के आयोजक काउंसिल ऑफ इंडियन ऑस्ट्रेलियंस के अध्यक्ष मोहित कुमा भी मानते हैं कि ऐसे आयोजन बच्चों को भारत में उनकी जड़ों से जोड़ने के लिए ज़रूरी हैं।

इस आयोजन का मुख्य आकर्षण रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम जिसमें फिल्मी गानों के अलावा पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों के लोक संगीत की झलकियां भी देखने को मिली। पंजाब से जहां भंगडा और गिद्दा ने रंग जमाया तो गुजरात के डांडिया को भी लोगों ने खूब पसंद किया लेकिन महाराष्ट्र के प्रसिद्ध नागपुर ढोल के थाप पर तो हर कोई झूम उठा। इस संगीतमयी शाम का समापन हुआ माता लक्ष्मी की महाआरती के साथ।

