होली का त्यौहार पूरे भारत में हर्ष उल्लास और परंपरा अनुसार मनाया जाता हैं. हर धर्म के लोग इसमें शामिल होते हैं. ये कोई नई बात नहीं हैं. उत्तर प्रदेश के लखनऊ में अंग्रेजों से पहले नवाबों का शासन था. नवाब मुसलमान थे और प्रजा हिन्दू. ऐसे में वो होली के त्यौहार में शामिल होते थे. रंग भी खेलते थे और कई नवाबों ने तो बाकायदा इसपर शायरी भी लिखी हैं.
आज भी ये परंपरा कायम हैं. जब होली का जुलूस निकलता है तो उसका स्वागत आज भी मुसलमान करते हैं. होली का रंग ऐसा चलता है कि क्या हिन्दू और क्या मुसलमान कोई फ़र्क नहीं रह जाता. आज भी लखनऊवासी होली के जुलूस का इंतज़ार करते हैं.
लखनऊ की इस एतिहासिक एकता की मिसाल होली के बारे में लखनऊ के जानकार हिमांशु बाजपेयी बताते हैं कि लखनऊ में हमेशा से हिन्दू और मुसलमान मिल कर होली खेलते आये हैं. यहाँ तक कि एक बारगी मुहर्रम होने के बावजूद भी लखनऊ में मुसलमानों ने होली मनाई. इस बारे में मशहूर शायर मीर तकी मीर ने भी लिखा हैं की नवाब आसिफुद्दौला होली खेलते थे.
नवाबो से पहले मुगलों का शासन रहा हैं. वो भी मुसलमान थे. ऐसे में उनके दौर में भी होली मनाने का वर्णन इतिहास में मिलता हैं. इस बारे में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद बताते हैं कि इस बात के पुख्ता प्रमाण भी उपलब्ध हैं. उनके अनुसार इस समय भी कई पेंटिंग मौजूद हैं जिसमे मुग़ल बादशाह होली खेल रहे हैं.
थोडा सा आगे चलते हैं. लखनऊ से कोई 50 किलोमीटर की दूरी पर देवा शरीफ नाम का क़स्बा हैं. वहां प्रसिद्ध सूफी संत हाजी वारिस अली शाह कि मज़ार हैं. उनके अनुयायी सभी धर्मो के हैं. होली वाले दिन वहां मजार परिसर में आज भी ज़बरदस्त रंग चलता हैं. ऐसा रंग जिसमे कोई हिन्दू न कोई मुसलमान रहता हैं. इस बारे में स्थानीय निवासी शावेज़ वारसी बताते हैं कि हाजी वारिस के मानने वालो में हिन्दू मुसलमान दोनों हैं और मिल जुल कर होली खेलते हैं.
