कहानी, एक छोटी सी - रेफ्यूजी

किसी तरह बड़ी मुश्किल से अफगानिस्तान के पहाड़ी रास्तों से होते हुए एक पुरानी वैन में कई दिन के सफर के बाद आखिर अहमद, उसकी खूबूसूरत नीली आंखों वाली बीवी फलक और 3 साल का बेटा सरहद पार करके पाकिस्तान पहुंचे.

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Sketches by Alan Mackay - Smith Source: SBS

किसी तरह बड़ी मुश्किल से अफगानिस्तान के पहाड़ी रास्तों से होते हुए एक पुरानी वैन में कई दिन के सफर के बाद आखिर अहमद, उसकी खूबूसूरत नीली आंखों वाली बीवी फलक और 3 साल का बेटा सरहद पार करके पाकिस्तान पहुंचे.

मानव तस्करों ने उन्हें ऑस्ट्रेलिया नाम के खूबसूरत देश में सुकून की जिंदगी गुजारने के लिए बड़ी रकम ली थी. बाकी का सफर कुछ दिन बाद नाव से होगा, ऐसा कहकर तस्कर सिगरेट का धुआं उड़ाता हुआ आगे निकल गया.

कई दिनों तक कभी वैन और कभी पैदल बहुत ही कठिन सफर करते हुए रात के वक्त एक सुनसान समंदर किनारे पहुंचे.

बेटा, अहमद के कंधे पर सिर रखकर सो रहा था और फलक चादर में अपना खूबसूरत चेहरा और डरी डरी आसमान जैसी नीली आंखें छुपाने की कोशिश करती रही. लेकिन उन आखों में एक नई खुशहाल जिंदगी के कई सपने छिपे हुए थे.

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मगर ये क्या...नाव खचाखच भरी थी. बाकी शरण मांगने वाले भी धक्का मुक्की करके उस छोटी सी नाव में जगह पाने की कोशिश कर रहे थे.

तस्कर ने अपने पेट पर हाथ फेरते हुए अहमद से कहा, आज तो आप में से कोई एक ही इंडोनेशिया जाने वाली इस नाव में सफर कर पाएगा.

अहमद ने हाथ जोड़कर बड़ी मिन्नतें कीं. मगर तस्कर ने पूरा भरोसा दिलाया कि उसको और उसके बेटे को अगली नाव में जरूर जगह मिलेगी. नहीं तो पांच हजार डॉलर और लगेंगे.

दिल पर पत्थर रखकर अहमद ने फलक को उस नाव से इंडोनेशिया जाने को कहा.

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और वायदा किया कि अगली नाव से वो बच्चे के साथ इंडोनेशिया पहुंचेगा.

फलक की समंदर जैसी नीली आंखें भर आईं. लेकिन इतने पैसे जाया होने के ख्याल से वो नाव में एक कोने में सहमकर जा बैठी.

पहाड़ियों की ताजा फिजाओं में घूमने वाली फलक कभी नाव पर नहीं बैठी थी. लेकिन नई जिंदगी के लालच ने उसे हौसला दिया.

कई दिन के बड़े कठिन सफर के बाद वह इंडोनेशिया पहुंची. वहां के गंदे शरणार्थी कैंप में दूसरे रोज रात के वक्त बत्ती चली गई.

वह अंधेरे में खेमे से बाहर जाने का रास्ता खोजने लगी.

उसके जिस्म पर कई हाथ एक साथ पड़े. चीखने को मुंह खोला तो एक हाथ ने जोर से मुंह बंद कर दिया. वह खामोश हो गई.

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कई हफ्ते गुजर गए. आखिर उसे ऑस्ट्रेलिया की तरफ जाने वाली नाव में बिठा दिया गया.

आज डिटेंशन सेंटर में रहते हुए फलक को एक साल गुजर चुका है.

इंडोनेशिया से निकलने के बाद वो एक शब्द नहीं बोली है. बिल्कुल खामोश.

सीने से तीन महीने की बच्ची को चिपकाये, खिड़की की सलाखों से बाहर की ओर टुकर टुकर देखते हुए उसकी नीली आंखें किसी का इंतजार करती रहती हैं.

लेखिका : कुमुद मिरानी


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