ये सम्मान इसलिए भी ख़ास है कि ऐसा न के बराबर देखा गया है कि पति पत्नी को ये सम्मान एक साथ मिला हो. हालांकि उमेश चन्द्रा कहते हैं कि चाहे बिज़नेस हो या सामाजिक कार्य उषा जी ने उनका हर जगह साथ दिया है. तो ऐसे में साथ सम्मान पाना सोने पर सुहागा जैसा है.
उमेश जी और उषा जी का साथ अबका नहीं है.. उमेश बताते हैं कि वो बचपन से एक दूसरे को जानते हैं और पहले भी वो सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे थे. वो चंडीगढ़ में कॉलेज में भी एक साथ पढ़े थे. उस दौर से अब तक बहुत कुछ बदला है लेकिन नहीं बदला तो सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहने की उनकी आदत.

हालांकि भारत से ऑस्ट्रेलिया आने का उनका भी वो ही मकसद था जो कि हर कोई अपनी ज़िंदगी के बारे में सोचता है. अच्छी ज़िंदगी.. अच्छी पढ़ाई. लेकिन फर्क बस इतना था कि वो यहां आकर इन्ही चीज़ों में फंसे नहीं रहे उन्होंने समाज की समस्य़ाओं की ओर मुड़कर देखा और साथ मिलकर उनका सामना भी किया. उमेश चंद्रा बताते हैं कि शुरूआत में उनके सामने यहां भारतीय समुदाय के अस्तित्व, समुदाय की पहचान और संस्कृति से ज़ुड़ाव बनाए रखने की समस्या थी. जिसे उन्होंने मंदिर और कुछ ऑर्गेनाइज़ेशन बनाकर हल करने की कोशिश की

उमेश चंद्रा बताते हैं कि उस दौर में जबकि ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्र कथित हिंसा का शिकार हो रहे थे. तब भी क्वींसलैंड सरकार ने उन्हें भारतीय छात्रों में विश्वास लौटाने का ज़िम्मा सौंपा था. उन्हें लाइज़िनिंग ऑफीसर का पद दिया गया ताकि वो भारतीय छात्रों से उनकी परेशानियों के बारे में बात कर सकें.
हालांकि वो कहते हैं कि भारतीय समुदाय के सामने अब वैसी समस्याएं नहीं हैं जैसी कि 30 साल पहले हुआ करती थीं. अब मौका है जबकि भारतीय समुदाय के लोग ऑस्ट्रेलिया के समाज में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं. वो कहते हैं कि इस सब के लिए पूरे समुदाय को एकजुटता दिखानी होगी. भारतीय समुदाय के लोगों को राजनीति में उतरते देखकर भी उन्हें खुशी है लेकिन वो फिर दोहराते हैं कि बिना सामूहिक शक्ति दिखाई इस क्षेत्र में भी कुछ नहीं किया जा सकता.
