इमिग्रेशन फ्रॉड को पकड़ने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ फार्मिंगटन यूनिवर्सिटी अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्यॉरिटी ने बनाई थी. इसे मार्च में बंद किया गया था और तब 161 छात्रों को गिरफ्तार किया गया था.
यूनिवर्सिटी को जब बंद किया गया तब उसमें 600 छात्र दाखिला ले चुके थे जिनमें से ज्यादातर भारतीय थे.
डेट्रॉयड फ्री प्रेस ने सबसे पहले यह खबर छापी जिसके बाद लोगों में काफी गुस्सा देखा जा रहा है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक इमिग्रेशन ऐंड कस्टम्स इनफोर्समेंट के प्रवक्ता ने बताया कि गिरफ्तार किए गए 250 विद्यार्थियों में से लगभग 80 फीसदी को खुद ही अमेरिका छोड़ देने का विकल्प दिया गया था. बाकी बचे छात्रों में से करीब आधे देश छोड़ने का आदेश पा चुके हैं.
अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि दाखिला लेते वक्त छात्र जानते थे कि यह एक फर्जी यूनिवर्सिटी है क्योंकि वहां कोई क्लास नहीं होती थी.
लेकिन बहुत से लोगों ने इस कदम की आलोचना की है.
राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवारी की डेमोक्रैट दावेदार सेनटेर एलिजाबेथ वॉरन ने इसे एक क्रूर कदम बताया. एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, "यह क्रूर और बेहूदा है. इन विद्यार्थियों ने अमेरिका में मिलने वाली बेहतर शिक्षा का सपना देखा था. ICE ने उन्हें धोखा दिया और सिर्फ डिपोर्ट करने के लिए उन्हें फांसा."
यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने वाले छात्र वैध वीसा पर अमेरिका गए थे. इनमें से ज्यादातर भारती थे जिन्हें भारत में अमेरिकी दूतावास ने वीसा दिया था.
डेट्रॉयट फ्री प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक फर्जी यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए छात्रों से 2500 अमेरिकी डॉलर प्रति सेमेस्टर फीस ली गई.
वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता कासिम रशीद ने एक ट्वीट कर कहा है कि यह सीधा-सीधा प्रलोभन देकर फांसने का मामला है.
उन्होंने लिखा, "भयानक! अमेरिकी सरकार ने फर्जी यूनिवर्सिटी बनाई. छात्रों से से लाखों डॉलर फीस ली. और फिर उनको गिरफ्तार करके डिपोर्ट कर दिया क्योंकि उन्होंने फर्जी यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. कैसे यह जालसाजी नहीं है? शर्मनाक."
