26 साल पहले लेडीज़ स्पेशल ट्रेन की शुरूआत
5 मई 1992 को भारत की वेस्टर्न रेलवे ने विश्व की पहली लेडीज़ स्पेशल ट्रेन चर्चगेट से बोरीवली के बीच शुरू की थी. इसके एक साल बाद ही इस सेवा को विरार तक बढ़ा दिया गया था. शुरूआत में ये ट्रेन दिन में केवल दो फेरे लगाती थी लेकिन तब से अब तक इस ट्रेन के फेरे प्रतिदिन 2 से बढ़कर 8 हो गए हैं.

आम लोकल ट्रेनों को पकड़ने में होने वाली असुविधा और ज्यादा भीड़-भाड़ से अलग इस स्पेशल ट्रेन का महिलाओं ने खासा स्वागत किया था। वेस्टर्न रेलवे की इस पहल के बाद देश के कुछ और इलाकों में इस तरह की पहल की गई। पिछले कुछ सालों में सरकार ने इन ट्रेनों को सीसीटीवी कैमरों के अलावा टॉक बैक सिस्टम से लैस करने और सुविधाएं बढ़ाने का भी दावा किया है।
महिलाओं की प्रतिक्रिया
एसबीएस ने जानने की कोशिश की कि आखिर मुंबई की महिलाओं की ज़िंदगी में ये स्पेशल ट्रेन कितना महत्व रखती है और क्या उन्हें इस ट्रेन को लेकर कोई कमी खलती है।
बोरीवली से परेल का सफर तय करने वाली महिला पत्रकार लक्ष्मी कहती हैं
“मैं 10 साल से मुंबई की ट्रेन में सफर कर रही हूं, कॉलेज के दिनों में ट्रेन में चढ़ने जो चैलेंज होता था उसे हम बहुत लाइटली लेते थे, लेकिन रोज़-रोज़ टाइम से ऑफिस पहुंचने की जरूरत ने सफर मुश्किल बना दिया था लेकिन मैं कहूंगी कि लेडीज़ स्पेशल ट्रेन ने महिलाओं को होने वाली परेशानी को काफी कम किया है”
उधर पिछले 30 सालों तक मुंबई के कई बैंकों नौकरी करने वाली अलका बताती हैं कि उन्हें कभी भी लेडीज़ स्पेशल ट्रेन का फायदा नहीं मिल सका. वो कहती हैं
“मैने 30 सालों की अपनी नौकरी में 70 फीसदी समय ट्रेन से ही सफर किया है, लेकिन मुझे कभी भी लेडीज़ ट्रेन का फायदा नहीं मिल सका. कारण था इसकी टाइमिंग, क्योंकि हर किसी क ऑफिस सुबह 10 से 6 नहीं हो सकता. हां काफी महिलाओं को इसका फायदा मिला है.”

सुधार की काफी गुंजाइश
अलका चाहती हैं कि ज्यादा लेडीज़ स्पेशल ट्रेन चलाना मुमकिन ना भी हो तो आम लोकल ट्रेनों में महिलाओं के लिए सुविधा बढ़ाई जानी चाहिए. उनके मुताबिक विकलांग और गर्भवती महिलाओं को खास तौर पर ट्रेनों में परेशानी का सामना करना पड़ता है और सरकार को ध्यान में रखना चाहिए कि ज्यादातर आर्थिक तौर पर कमज़ोर महिलाएं की भीड़-भाड़ वाली ट्रेन में सफर करने पर मजबूर होती हैं।
विश्व की पहली महिला स्पेशल ट्रेन के 26 साल पूरे करना एक बड़ा मील का पत्थर है और इस मौके पर उम्मीद की जानी चाहिए कि कामकाजी महिलाओं के आवाज़ तरजीह देकर सरकार उनकी सुविधाओं के लिए जरूरी कदम उठाएगी।
