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अंग्रेजों से ऐसे ली गई थी जलियांवाला बाग की जमीन

Jallianwala Bagh
Amritsar's Jallianwala Bagh marked a turning point in India's freedom struggle. Source: Wikimedia/Parthapakray

वैसे तो भारत को आज़ाद हुए 72 साल हो गए हैं लेकिन स्वतंत्रता आन्दोलन में बलिदान की सबसे बड़ी घटना के इस साल सौ साल पूरे हो चुके हैं. भारतीयों के दिल और दिमाग पर अभी भी जलियांवाला बाग कांड का नृशंस गोलीकांड के जख्म अंकित हैं. लेकिन एक बंगाली परिवार सौ साल से इस जलियाँवाला बाग़ को हर वक़्त जीता है, महसूस करता है और इसकी देखभाल करता हैं.


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By Faisal Fareed

Source: SBS


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वैसे तो भारत को आज़ाद हुए 72 साल हो गए हैं लेकिन स्वतंत्रता आन्दोलन में बलिदान की सबसे बड़ी घटना के इस साल सौ साल पूरे हो चुके हैं. भारतीयों के दिल और दिमाग पर अभी भी जलियांवाला बाग कांड का नृशंस गोलीकांड के जख्म अंकित हैं. लेकिन एक बंगाली परिवार सौ साल से इस जलियाँवाला बाग़ को हर वक़्त जीता है, महसूस करता है और इसकी देखभाल करता हैं.


साल 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में लगभग पांच हजार हिन्दुस्तानी रॉलेट ऐक्ट के विरोध में शांतिपूर्वक सभा कर रहे थे. हर तरफ से आबादी से घिरे हुए इस बाग में ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल आर ई एच डायर ने फौज के साथ प्रवेश किया. आने जाने का एकमात्र रास्ता बंद करवा दिया. उसके बाद चली अंधाधुंध 1650 राउंड गोलियां जिसमें लगभग 1500 भारतीय शहीद हो गए. इसमें बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं सभी थे.

कम लोग जानते हैं कि इस जलियांवाला बाग की देखभाल एक ट्रस्ट करती है. उसमें मेम्बर सेक्रटरी हैं सुकुमार मुख़र्जी जो पिछली तीन पीढ़ी से इस राष्ट्रीय धरोहर की देखभाल कर रहे हैं. बंगाली परिवार से सम्बन्ध रखने वाले सुकुमार अब 65 साल के हैं लेकिन अब उनकी कई पीढ़ियां इस स्मारक में बीत गयी हैं.

सुकुमार ऐसे ही नहीं इस जलियांवाला बाग से जुड़ गए. जब 13 अप्रैल 1919 को गोलियां चली थीं तो एक डॉ. शष्टि चरण मुख़र्जी वहां मौजूद थे. वह बंगाल में हुगली के रहने वाले थे. उन्हें कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय ने वहां भेजा था. मुखर्जी उस दिन गोली बारी में बच गए थे.

घटना के बाद ब्रिटिश सरकार उस जलियांवाला बाग को ख़त्म कर देना चाहती थी. वहां पर एक कपड़ा बाज़ार बनाने की योजना थी. लेकिन डॉ. मुख़र्जी के दिल पर इस घटना ने इतना प्रभाव छोड़ा कि उन्होंने वहां एक स्मारक बनवाने के लिए महात्मा गांधी को पत्र लिखा. उस समय कांग्रेस ने इस मुहिम को शुरू किया और ज़मीन की कीमत लगी 5.65 लाख. पैसा इकठ्ठा करने के लिए गांधी जी द्वारा अपील जारी हो गयी. जब ज़मीन बिकी तो डॉ. मुख़र्जी ने इसे खरीद लिया. इस पर वह गिरफ्तार भी हुए लेकिन जमीन एक ट्रस्ट के नाम कर दी गयी. डॉ. मुख़र्जी इस ट्रस्ट के सचिव बने. साल 1962 में उनकी मृत्य के बाद उनके बेटे उत्तम चरण मुख़र्जी इसके सचिव बने और आज इसके सचिव हैं उनके पोते सुकुमार मुख़र्जी.

इस तरह यह भारत का अकेला ऐसा परिवार है जो पिछली तीन पीढ़ी से एक राष्ट्रीय स्मारक की देखभाल कर रहा है. अपनी इस पूरी पारिवारिक विरासत के बारे में सुकुमार बताते हैं कि बहुत सी बातें उन्होंने अपने दादाजी और पिताजी से सुनी और सीखी.

आज सुकुमार कभी कभी व्यथित हो जाते हैं. नई पीढ़ी के लिए जलियांवाला बाग सिर्फ एक पार्क तक सीमित रह गया है. वहां पर मौजूद दीवारों में गोली के निशान, शहीदों की पुकार, कुएं में कूद गए हजारों लोग, ये सब उनको नहीं दिखता. सुकुमार इस सबसे परेशान हो जाते हैं. अपनी पीड़ा वह कह भी नहीं पाते.

सुकुमार को काफी तकलीफें भी उठानी पड़ीं. वह वहीं जलियांवाला बाग़ में एक कमरे में रहते हैं. यही उनके परिवार का आशियाना पिछली तीन पीढ़ी से है जो फिर अपने पैतृक स्थान बंगाल नहीं लौटा. ऐसा जज्बा आज कम ही देखने को मिलता है.

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