भारत से लौटकर - हमारी इस नई सीरीज में हम उन लोगों से बात करते हैं जो हाल ही में भारत से लौटे हैं. उनके भारत से जुड़े अनुभव साझा रने के लिए ही हमने यह सीरीज शुरू की है. अगर आप हाल ही में भारत से लौटे हैं और अपने अनुभव हमसे साझा करना चाहते हैं तो हमें फेसबुक पर मेसेज करें.
अजीत सिंह, सिडनी
घर जाना तो सुखद ही होता है. अपनों से मिलना, परिवार के साथ वक्त बिताना अच्छा ही लगता है. लेकिन हमारी यात्रा की शुरुआत खराब रही. एयरपोर्ट पर हमारा अनुभव बहुत परेशान करने वाला रहा. हमारा दिल्ली में स्टे था लेकिन एयरलाइंस की मैनेजमेंट इतनी खराब थी कि किसी को पता हीं नहीं था, हमें कहा ठहराया जाना है. काफी इंतजार के बाद आखिरकार हमें एक होटल भेजा गया. लेकिन यह एक घटिया होटल था और हमें बहुत खराब लगा.
पर मुझे लगता है कि अभी भी असली तरक्की दूर है. अमीर तो अमीर होता जा रहा है लेकिन जब तक गरीब की तरक्की नहीं होगी, गांवों की तरक्की नहीं होगी, दूर दराज के पिछड़े इलाकों की तरक्की नहीं होगी, तब तक भारत का आगे बढ़ पाना मुश्किल है.
हम हालांकि ज्यादातर चंडीगढ़ में ही रहे और आस पास कुछ शहरों में घूमे. देखकर लगता है कि भारत बदल रहा है. इंटरनेट की उपलब्धता देखकर अच्छा लगा. शहरों में तरक्की भी दिख रही है. लेकिन साफ-सफाई का हाल तो बुरा ही है. मेरी तीन साल की बेटी मेरे साथ थी. उसका पहला सवाल था कि यहां सड़कों पर इतने कुत्ते क्यों घूमते हैं. फिर उसने पूछा कि यहां इतना गंदा क्यों है. बच्चों के सवाल मासूम होते हैं. हम तो जानते हैं लेकिन बच्चों को कैसे समझाया जाए. उनके सवालों का जवाब देना मुश्किल हो जाता है.
फिर वहां कामकाज के सिस्टम ने भी बहुत परेशान किया. मेरा अपने पुरानी सरकारी दफ्तर में काम था लेकिन कई चक्कर लगा लेने के बाद भी काम नहीं हो सका. सरकारी कर्मचारियों का ऐटीट्यूड नहीं बदला है. और ये बहुत परेशानी की बात है.
(विवेक कुमार से बातचीत पर आधारित)




