मैथिली शरण गुप्त कहते हैं
करो अपनी भाषा पर प्यार।
जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार।।
अपने दौर में अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध कह गये हैं
आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नामही।
इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिंदी भाषा है वही।।
जी हां बात हिंदी की हो रही है. आपको पता है भारत के अलावा हिंदी फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम के साथ ही त्रिनिदाद और टोबेगो में भी बोली जाती है. आज के दौर में भारतीय और हिंदी भाषी लोग दुनिया के लगभग हर देश में प्रवास कर रहे हैं. ज़ाहिर है उनका हिंदी प्रेम उन्हें वहां भी हिंदी बुलवा ही लेता है. ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक देश की बात करें तो यहां हर भाषा की तरह हिंदी भी सम्मानित है. अच्छी बात ये है कि हिंदी के लिए न केवल यहां रहने वाले भारतीय मूल के लोग उत्साहित हैं बल्कि सरकार की ओर से भी हिंदी तो खासा महत्व दिया जाता है. ऑस्ट्रेलिया के कई स्कूलों में हिंदी पढ़ायी भी जाती है. और भारत के एक बड़ी और तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था की वजह से हिंदी भाषा को भारत और भारतीयों से संबंध स्थापित करने के सहायक के तौर पर भी देखा जाता है.

हिंदी के प्रति ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीय मूल के बच्चों का क्या रुझान है. और कैसे सीखते हैं वो हिंदी इसके बार में जानने के लिए हम पहुंचे सिडनी में वेन्टवर्थविल सबअर्ब के डारसी रोड पब्लिक स्कूल में जहां प्रिंसिपल ट्रूडी हॉपकिन्स बताती हैं कि
हमारे स्कूल में हिंदी, अंग्रेज़ी के बाद सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. इसलिए हमने साल 2016 में शिक्षा विभाग से उनके स्कूल में हिंदी पढ़ाए जाने की सिफारिश की थी. जिसे मान लिया गया.
डारसी रोड पब्लिक स्कूल में हिंदी की शिक्षिका कुलविंदर कौर बताती हैं कि हिंदी का ये कार्यक्रम उन बच्चों के लिए हैं जो भारतीय मूल के हैं और हिंदी सीखना चाहते हैं. एकता चनाना भी डारसी रोड पब्लिक स्कूल में हिंदी पढ़ाती हैं. हिंदी की कक्षा में बच्चों को लेने की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए वो कहती हैं कि भारतीय मूल के बच्चों के सामने स्कूल में प्रवेश के वक्त हिंदी सीखने का विकल्प रखा जाता है.
कुलविंदर कौर बताती हैं कि उनके पास हिंदी पढ़ने के लिए आने वाले बच्चे शुरूआत में थोड़ा घबराए हुए थे. शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें करना क्या होगा और वो एक नई भाषा कैसे सीख पाएंगे? लेकिन वो कहती हैं कि साधारण तौर पर हिंदी पढ़ाने के साथ साथ उन्होंने हिंदी के गानों और नृत्य का भी सहारा लिया. कुलविंदर मानती हैं कि गीत किसी भाषा को सीखने में ज्यादा सहायक होते हैं.

हालांकि वो कहती हैं कि बच्चों को हिंदी व्याकरण में थोड़ा सा परेशानी होती है. लिखना भी अभी आसान नहीं है, लेकिन पढ़ने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती. वो कहती हैं कि जिनके घर में हिंदी बोली जाती है वो बच्चे उनकी हिंदी कक्षा में बाकी बच्चों की तुलना में ज्यादा स्वाभाविक प्रदर्शन कर पाते हैं.
प्रिंसिपल ट्रूडी कहती हैं कि हिंदी के बाद उनकी योजना तमिल को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल कराने की है. क्योंकि हिंदी के बाद तमिल भाषी बच्चे इस स्कूल में ज्यादा हैं. कुलविंदर कहती हैं कि
भारतीय मूल के बच्चों के लिए हिंदी न केवल एक भाषा है बल्कि उनकी एक पहचान भी है. वो कहती हैं कि संस्कृति और भाषा एक दूसरे से अलग नहीं हैं.




