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चंबल में रहने वाले डाकू फिल्मी नहीं होते

Temple of a dacoit Dadua

Temple of a dacoit Dadua Source: Faisal Fareed

डाकुओं के किस्से हमेशा कहानियों और फिल्मों में रहते हैं. उनकी छवि फिल्मों में ऐसी बनाई गई जैसे वे गरीबों की मदद करते हैं और अन्याय के खिलाफ लड़ते हैं. फिल्मी डाकू गब्बर सिंह के डायलॉग तो आज तक लोगों की जुबान पर हैं. पर असलियत में डाकू वैसे नहीं होते. बता रहे हैं फैसल फरीद.


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By Faisal Fareed

Source: SBS



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डाकुओं के किस्से हमेशा कहानियों और फिल्मों में रहते हैं. उनकी छवि फिल्मों में ऐसी बनाई गई जैसे वे गरीबों की मदद करते हैं और अन्याय के खिलाफ लड़ते हैं. फिल्मी डाकू गब्बर सिंह के डायलॉग तो आज तक लोगों की जुबान पर हैं. पर असलियत में डाकू वैसे नहीं होते. बता रहे हैं फैसल फरीद.


भारत की चम्बल घाटी में अभी भी डाकू मौजूद हैं. समय समय पर नए चेहरे डाकू बनते रहे, कुछ ने आत्मसमर्पण कर दिया, कुछ पुलिस से मुठभेड़ में मारे गए, कई पकडे गए और जेल में हैं. कुछ राजनीति में आये और सांसद भी बन गए. कइयों ने तो इतना रसूख बनाया कि उनका मंदिर तक बन गया. हालांकि अब उनकी रॉबिनहुड इमेज तो कम होती जा रही है लेकिन अभी भी इन डाकुओं की कहानियां आपको चम्बल के इलाके में सुनने को मिल जाएंगी.

चम्बल का इलाका बुंदेलखंड में आता है और इसे पाठा भी कहते हैं. पिछले कई दशकों में अब तक 24 डकैत मारे जा चुके हैं. 33 जेल में हैं. नामी डकैत मारे जाते हैं लेकिन फिर कुछ दिन बाद एक नया डकैत सामने आ जाता है. धीरे धीरे गैंग बना लेता है, हथियार इकठ्ठा कर लेता है और खूनी खेल फिर शुरू हो जाता हैं.

अभी 24 अगस्त को चम्बल में डाकुओं से हुई मुठभेड़ में फिर से एक बार सारी बातें सामने आ गई हैं. उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जनपद में चम्बल के बीहड़ों में हुई मुठभेड़ में पांच लाख का इनामी डाकू बबली कोल एक बार फिर भागने में सफल हो गया. हालांकि पुलिस ने उसके साथी डकैत को मार गिराया और कुछ को पकड़ भी लिया. इस मुठभेड़ में फिर एक पुलिस अधिकारी जे पी सिंह शहीद हो गए और कुछ पुलिसकर्मी घायल भी हुए.

डकैतों की ये परंपरा चम्बल में काफी पुरानी है. शुरुआत में डकैत अपने आप को बागी कहलाना पसंद करते थे. उनके हिसाब से समाज में हुए उत्पीड़न से तंग आकर वो चम्बल का रुख कर लेते थे और बागी बन जाते थे. कभी डाकू मलखान सिंह, डाकू मान सिंह और दस्यू फूलन देवी के किस्से मशहूर थे. हालांकि ये अपने अपराध को छुपाने का एक जरिया मात्र हैं.

पिछले कई दशकों में सबसे ज्यादा नाम फूलन देवी का आया. फूलन ने अपने पर हुए अत्याचार के बदले में बेहमई में कई ठाकुरों को गोली से भून दिया. फूलन ने सरेंडर किया और बाद में वो चुनाव जीत कर सांसद भी बन गईं. लेकिन फिर उनकी हत्या हो गयी. उनके जीवन पर बैंडिट क्वीन फिल्म भी बनी. फूलन को मानने वाले आज भी हैं और उनके समर्थक फूलन सेना तक का गठन कर चुके हैं लेकिन अब कोई झुकाव बीहड़ की तरफ नहीं है.

उसके बाद शिवकुमार उर्फ़ ददुआ का आतंक सर चढ़ कर बोला. लेकिन उसका भी एनकाउंटर हो गया. लेकिन इस बीच में ददुआ ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया. उसका भाई सांसद बना, उसका बेटा और भतीजा विधायक बन गए. उसके मृत्य के बाद अब ददुआ की मूर्ति एक मंदिर में स्थापित कर दी गयी है.

चम्बल के बीहड़ों में डाकुओं की अपनी ज़िन्दगी होती है. इधर कुछ सालों से वे महिलाओ को भी गैंग में शामिल कर लेते हैं. सीमा परिहार, रेनू आदि किसी न किसी गैंग की सदस्य रही हैं. बीच में कुछ डकैत जैसे निर्भय गुर्जर बाकायदा टीवी पर इंटरव्यू देने लगे.

ददुआ का शिष्य अम्बिका उर्फ़ डॉक्टर भी दुर्दांत डकैत साबित हुआ. उसने एक बार में छह जवानों की हत्या कर दी थी लेकिन आखिरकार मारा गया.

अब सवाल ये उठता है कि कैसे इन डाकुओं को संरक्षण मिल जाता है. उत्तर प्रदेश में डाकुओं की पैदावार बढ़ी, वो ताकतवर हुए तो इसमें बहुत बड़ा हाथ उनको जातिगत संरक्षण भी है. फूलन देवी अपने समुदाय मल्लाह और निषाद की नेता बन कर उभरी तो ददुआ का वर्चस्व अपनी कुर्मी बिरादरी पर रहा. चम्बल के इलाके में गांव गांव में ये अपनी जात बिरादरी के लोगों पर असर रखते हैं. यहीं नहीं, इनको वोट में भी तब्दील करवा देते हैं. एक ज़माने में इनका फरमान चलता था कि फलां उम्मीदवार को वोट देना हैं. हालांकि ये अब इधर कम हो गया हैं. कुछ उनकी बिरादरी के लोग भी उनसे हमदर्दी रखने लगे और खाना, शेल्टर और सूचनाएं पहुचाने में मदद करने लगे.

दूसरी बड़ी बात ये रही कि अब डाकू फिल्मों की तरह घोड़े से नहीं चलते. उनका मुख्य जरिया लूटपाट नहीं रहा. अब  वे अपहरण और फिरौती में लिप्त हैं. इसके अलावा सरकारी विकास कार्यों जैसे सड़क और पुल बनवाने पर ठेकेदारों से वसूली करने लगे. बीड़ी बनाने में काम आने वाला तेंदू पत्ता की ठेकेदारी में भी रंगदारी वसूलने की घटनाएं आई हैं.

चम्बल की घाटी डाकुओं की शरणस्थली रही है. बड़े बड़े मिटटी के टीले, कांटेदार जंगल, दुर्गम रास्ते, ये सब इनको छिपने की जगह दे देते हैं. हालांकि इधर सुरक्षा बल और पुलिस भी मुस्तैद हो गए हैं. लगभग सभी नामी डाकू मार दिए गए या फिर जेल में हैं.सबसे बड़ा इनामी डकैत बबली कोल ही बचा है जिसके ऊपर उत्तर प्रदेश सरकार ने पांच लाख और मध्य प्रदेश ने तीस हज़ार का इनाम घोषित कर रखा है.

चम्बल के पत्रकार जियाउल हक जिन्होंने पिछले एक दशक से डाकुओं पर रिपोर्टिंग की, मानते हैं कि डाकुओं को संरक्षण अपनी जाति के लोगों के अलावा सफेदपोश नेताओं से भी मिलता है. जियाउल हक ने बीहड़ के जंगलों से कई बार खतरनाक डाकुओं से सम्बंधित खबर की है. उनके अनुसार डाकू पनपने का एक कारण बुंदलेखंड की गरीबी, पिछड़ापन और बेरोज़गारी भी है.

लेकिन ये भी सोचने वाली बात है कि इन डाकुओं से लोहा लेने में हमने बहुत जवान खोये हैं. अकेले बांदा जिले से आज़ादी के बाद से अब तक 47 जवान शहीद हो चुके हैं.


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