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क्या पत्नी को पीटने वाले पुरुष कभी सुधरते हैं?

The review stems from the Royal Commission into Family Violence

The review stems from the Royal Commission into Family Violence Source: AAP

जिन पुरुषों को पारिवारिक हिंसा का दोषी पाया जाता है, उन्हें बिहेवियर-चेंज प्रोग्राम्स यानी ऐसी योजनाओं में भेजा जाता है जहां उनके हिंसक व्यवहार को बदला जा सके. लेकिन सवाल ये उठ रहे हैं कि इन योजनाओं का कुछ फायदा होता है या नहीं. पेश है एलिस रेनिसन की यह रिपोर्ट...


Published

By Alice Rennison

Source: SBS




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जिन पुरुषों को पारिवारिक हिंसा का दोषी पाया जाता है, उन्हें बिहेवियर-चेंज प्रोग्राम्स यानी ऐसी योजनाओं में भेजा जाता है जहां उनके हिंसक व्यवहार को बदला जा सके. लेकिन सवाल ये उठ रहे हैं कि इन योजनाओं का कुछ फायदा होता है या नहीं. पेश है एलिस रेनिसन की यह रिपोर्ट...


विक्टोरिया में घरेलू हिंसा का अध्ययन करने के लिए पिछले साल एक रॉयल कमीशन बनाया गया था. उसकी एक खास सिफारिश ये है कि व्यवहार सुधार के लिए बनाए जाने वाले 'मेन्ज ग्रुप्स' की समीक्षा की जाए. असल में इन समूहों में ज्यादातर लोग वे होते हैं जिन्हें अदालत घरेलू हिंसा का दोषी मान चुकी होती है. ये लोग कोर्ट के हुक्म से ही समूहों में जाते हैं. आमतौर पर ये समूह 12 से 13 हफ्ते तक दो घंटे प्रति सप्ताह की दर से चलते हैं. ऐसा एक समूह चलाती है विक्टोरिया की संस्था 'नो टु वायलेंस.' यह संस्था इन योजनाओं को ज्यादा सटीक और असरदार बनाने के लिए सुझाव भी देती है. नो टु वायलेंस के स्ट्रैटिजिक मैनेजर माइकल ब्रैंडनबुर्ग कहते हैं कि अभी जो व्यवहार सुधार समूह चल रहे हैं वे ज्यादा असरदार नहीं हैं क्योंकि वे कम समय तक चलते हैं. ब्रैंडनबुर्ग कहते हैं, हम इस बात की सिफारिश कर रहे हैं कि सुधार समूहों का समय बढ़ाया जाए. लोगों को कम से कम 24 सेशन मिलने चाहिए यानी 48 घंटे.

मोनाश यूनिवर्सिटी की जेंडर एंड फैमिली वायलेंस टीम इन व्यवहार सुधार समूहों की समीक्षा कर रही है. और एक टीम इन मेन्ज ग्रुप्स पर रिसर्च भी कर रही है. हाल ही में इस टीम ने हिंसा के दोषी पाए गए 300 पुरुषों और उनके जीवनसाथियों से बात की. और ज्यादातर जीवनसाथियों ने बताया कि मेन्ज ग्रुप्स में जाने के दो साल के भीतर ही उनके पुरुष साथी हिंसक नहीं रह गये थे.

लेकिन लंदन में हुई एक स्टडी बताती है कि ये व्यवहार सुधार समूह गैर-शारीरिक हिंसा में कोई कमी नहीं कर पाते. जैसे अपशब्द कहना या भावनात्मक प्रताड़ना में कोई असर न हीं देखा गया है. मेलबर्न यूनिवर्सिटी में सोशल वर्क की प्रोफेसर कैथी हंफ्रीज कहती हैं कि भावनात्मक हिंसा भी उतनी ही खतरनाक होती है जितनी कि शारीरिक हिंसा. हंफ्रीज कहती हैं, ये पुरुष आमतौर पर अपनी पत्नियों को बहुत ज्यादा नियंत्रण में रखते हैं. ये बहुत नाटकीय और विनाशकारी तरीके से आपके वजूद को झकझोर सकते हैं.

इनटच मल्टिकल्चरल सेंटर अगेंस्ट फैमिली वायलेंस की फाये स्पिटेरी को लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया को अच्छी तरह समझने के लिए ज्यादा आंकड़ों की जरूरत है.

अब ये व्यवहार सुधार समूह कितने कामयाब हो रहे हैं, इसका पता तो अगले साल ही चल पाएगा जबकि समीक्षा रिपोर्ट आएगी.

 


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