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जो हमने खोया है उसकी भरपाई में दशकों लग सकते हैं

A CFS volunteer gives a koala a drink of water from a bottle, as firefighters battle the Cudlee Creek, South Australia, bushfire.
A CFS volunteer gives a koala a drink of water from a bottle, as firefighters battle the Cudlee Creek, South Australia. Source: CFS

ऑस्ट्रेलिया भर में आग से हुई तबाही का सही अंदाज़ा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है. क्योंकि संपत्तियों के नुकसान की भरपाई तो की जा सकती है लेकिन इस भीषण आग में मारे गए एक बिलियन से ज्यादा जानवरों की जो पर्यावरण में जैविक महत्व था क्या कभी उसकी भरपाई हो पाएगी.


Published

By Peggy Giakoumelos

Presented by Gaurav Vaishnava

Source: SBS



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ऑस्ट्रेलिया भर में आग से हुई तबाही का सही अंदाज़ा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है. क्योंकि संपत्तियों के नुकसान की भरपाई तो की जा सकती है लेकिन इस भीषण आग में मारे गए एक बिलियन से ज्यादा जानवरों की जो पर्यावरण में जैविक महत्व था क्या कभी उसकी भरपाई हो पाएगी.


 

विशेषज्ञों का मानना है कि इस नुकसान की भरपाई में दशकों या फिर उससे भी ज्यादा समय लग सकता है. हालांकि एक बिलियन के इस अनुमान में चमगादड़ और मेंढक व दूसरी कई इस तरह के जानवरों को शामिल नहीं किया गया है विशेषज्ञ मानते हैं कि इनकी महत्ता भी कम नहीं है. हालांकि विशेषज्ञों ने पहले अनुमान लगाया था कि बुश फायर के इस सीज़न में करीब आधा बिलियन जानवर मारे गए हैं लेकिन अब उनका मानना है कि ये आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा यानी 1 बिलियन से भी ज्यादा का है . 

हालांकि ज्यादातर प्रभावित जानवर वो हैं तो कि बड़े हैं और ज्यादा तेज़ नहीं चल सकते जैसे कि क्वाला, और कुछ ऐसे भी जानवर हैं जिनकी जनसंख्या बहुत कम है और अब उनके विलुप्त होने का ख़तरा बना हुआ है. बाकी दूसरे प्रभावित जानवरों में से लंबे पैर वाले पोटोरू, कॉकाटू और डायमंड पायथन जैसे जानवर हो सकते हैं. 

प्रोफेसर डेरिल जोन्स ग्रिफिथ विश्वविद्यालय के इन्वारनमेंटल फ्यूचर रिसर्च इंस्टिट्यूट के उप निदेशक हैं. वो कहते हैं कि अतीत में भी आग लगी हैं लेकिन इनका पारिस्थितिकी पर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ता है.

ज्यादा जानवरों के मारे जाने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण दिखता है वो है आग का बहुत तेज़ी से बढ़ना. अब आग के बाद खाने की कमी और जल चुके पठारों का मतलब है कि जो जानवर बच गए हैं उनमें से भी कई की.. चोट, बीमारी, और भूख की वजह से मारे जाने की आशंका है और कई छोटे जानवर बड़े शिकारी जानवरों की चपेट में होंगे.

प्रोफेसर जोन्स कहते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर आग से तबाही के बाद अब जानवरों की बेहतर मदद के लिए नए नियम लागू करने की ज़रूरत है. वो कहते हैं कि आग की त्रासदी से बचे जानवरों के पास अब खाने के लिए कुछ नहीं होगा. वो इन जानवरों के खाने के लिए अनाज, जानवरों का पैक्ड खाना, और फ्रोज़न मटर जैसी चीज़ों को बाहर रखने की वकालत करते हैं. लेकिन वो कहते हैं कि लोग ब्रेड, कीमा, और ऐसी वस्तुए जिनमें नमक या चीनी हो बाहर रखने से बचें.

डॉक्टर जोन्स कहते हैं कि हमें इस बात को दोष देना छोड़ना होगा कि आग बहुत बड़ी थी.. बल्कि हमें साथ मिलकर काम करना होगा क्योंकि इस वक्त में ये ही ज़रूरत है.

डॉक्टर एंड्र्यू पीटर चार्ल्स स्टर्ट विश्वविद्यालय के पशुओ के लिए पैथोलॉजी में वरिष्ठ लैक्चरर हैं. वो कहते हैं कि वन्य जीवों पर इस आग के प्रभाव को सही तरीके से नहीं समझा जाता है. वो मानते हैं कि नुकसान केवल जानों का नहीं है. इसके इतर आग से जलकर लगने वाली चोटें, धुएं कि कारण वन्य जीवों को होने वाला नुकसान, साथ ही पोषण और व्यवहार संबंधी तनाव भी अहम पहलू हैं. डॉक्टर पीटर कहते हैं कि इस भीषण आग से पहले भी सूखे और दूसरे पर्यावरणीय कारणों से जानवरों को अपनी जान गंवानी पड़ी हैं.

डॉक्टर पीटर कहते हैं कि आग से बचने वाले कई जानवरों को अब शिकारी जानवरों का ज्यादा ख़तरा है क्योंकि इन परिस्थितियों में वो ज्यादा सक्रिय हो जाएंगे. डॉक्टर स्टुअर्ट ब्लांच वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड ऑस्ट्रेलिया के लैंड क्लीयरिंग और री-स्टोरेशन विभाग में वरिष्ठ प्रबंधक हैं. उनका कहना है कि पालतू जानवर और वन्य जीवों के देखभाल करने वाले इस वक्त बेहद तनाव से गुज़र रहे हैं और उन्हें तत्काल मदद की ज़रूरत है. डॉक्टर ब्लांच का मानना है कि भविष्य में पर्यावरण संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने की ज़रूरत है. 


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