यूनियन की कहना है कि फेडरल सरकार को इस सम्बन्ध में हस्ताक्षेप करना चाहिये था । लेकिन बिजनस समुदाय को लगता है कि इससे अब और कई लोगों को नौकरी पर रक्खा जा सकेगा।
भारतीय समुदाय से एक युवा जिसने अभी अभी पढ़ाई खत्म करके नौकरी शुरू की है उसका कहना है कि चाहे और कुछ लोगों को नौौकरी की बात सही है लेकिन यह सब किस कीमत पर है. उसकी कहना है कि उसकी स्वम् के भविष्य की कई योजनायें अब प्रभावित होंगीं ।
अनीता महाजन जो शिफ्ट के अलावा सप्ताहंत पर काम करती हैं और वह एक कम्यूनिटी सपोर्ट वर्कर हैं, यूँ उनके अपने काम पर, पहले से ही दुसरे रेटस् लागु होते हैं ।
और उन्हें चिन्ता है विदेश से आने वाले स्टूडेन्टस् की जो सप्ताहंत पर काम करके ही अपनी फीस आदि का बन्दोबस्त करते हैं । वह कहती हैं कि वह लोग तो सप्ताहंत पर ही काम कर सकते हैं पढ़ाई के साथ और निर्भर करते हैं कि ताकि कुछ अधिक पैसे कमा कर साथ में कुछ बचत कर सके।
कुछ इसी तरह की बात करती हैं सोनिया नागपाल जो पहले कभी सेताहंत पर काम किया करती थी। वह कहती हैं कि इससे निम्न आय वालों पर बहुत असर पड़ेगा।
फिलहाल रेटस् में कटौती, यह एक विवाद का विषय बना हुआ है ।



