बलुआ पत्थर से गढ़ा यह किला भारत के सबसे महान किलों में से एक है, और इसकी अद्भुत सुंदरता को देखते हुये मुगल बादशाह बाबर ने इसे "भारत के किलों के हार का मोती" कहा था।
कलाकारों ने बड़ी चट्टानों को न केवल तराशा, बल्कि उनमें सुंदर नक्काशी और चित्र भी उकेरे, जो उस समय के समाज और धर्म के विचारों को दर्शाते हैं।
किले की ये संरचनाएं भारतीय कला की गहराई और प्राचीनता को प्रदर्शित करती हैं।

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मान्यता है कि इस किले की नींव राजपूत सरदार सूरज सेन ने रखी थी। कहा जाता है कि एक बार जंगल में शिकार के दौरान वह ग्वालप ऋषि से मिले जिनके आशीर्वाद से उनका चर्म रोग ठीक हो गया। अपने इस गुरु के प्रति आदर स्वरूप उन्होंने इस किले को बनवाया और इसे ग्वालियर कहा। समय के साथ विभिन्न शासकों ने इस किले में अनेक भवन जोड़े।

एकांत पथरीली पहाड़ी पर बना यह किला कई ऐतिहासिक इमारतों का घर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए, एक काफी खड़ी चढ़ाई वाला रास्ता है, जो बाद में सीढ़ियों मे बदल कर चढ़ाई को आसान बनाता है। इस चट्टान की समुद्र तल से अधिकतम ऊँचाई 104 मीटर है।
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