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"मैं इंसान हूं, दूसरों के दुख कैसे चुपचाप देखता रहूं"

Roshan Raturi_Community Hero_UAE
Source: Supplied

रौशन उन लोगों की मदद करते हैं जो कि वीज़ा धोखाधड़ी का शिकार होकर यू ए ई पहुंचते हैं. वो आते तो पैसा कमाने के लिए हैं लेकिन यहां वो भारी मुसीबत में पड़ जाते हैं. काम तो दूर उन्हें रहने और खाने की परेशानी उठानी पड़ती है, ऊपर से कानूनी ख़तरा.


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By Gaurav Vaishnava

Source: SBS


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रौशन उन लोगों की मदद करते हैं जो कि वीज़ा धोखाधड़ी का शिकार होकर यू ए ई पहुंचते हैं. वो आते तो पैसा कमाने के लिए हैं लेकिन यहां वो भारी मुसीबत में पड़ जाते हैं. काम तो दूर उन्हें रहने और खाने की परेशानी उठानी पड़ती है, ऊपर से कानूनी ख़तरा.


अक्सर आपने भारतीय या दूसरे देशों से बाहर पैसा कमाने गए लोगों के गलत वीज़ा या धोखाधड़ी का शिकार होकर फंस जाने के समाचार पढ़े या देखे होंगे. और ये सोचा भी ज़रूर होगा कि अब उनका क्या होगा. अक्सर दूसरे की परेशानियों पर हम ज्यादा कुछ कर पाने में खुद के अक्षम पाते हैं कि लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनमें वो जज़्बा हिम्मत और धैर्य है. जो कि दुख के आंसुओं को खुशी में बदल सकता है

ऐसी ही एक शख्सियत से हम आपको मिला रहे हैं. नाम हैं रौशन रतूड़ी. रौशन भारत के उत्तराखंड के रहने वाले हैं और इन दिनों दुबई यूएई में रहते हैं. इससे पहले वो ओमान जैसे देशों में भी रह चुके हैं. दरअस्ल रौशन यूएई में फंसे लोगों की उम्मीद का दूसरा नाम बन चुके हैं.

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ऐसा शायद ही कोई दिन होता है जब वो गलत वीज़ा पर आए लोगों या फिर वीज़ा एजेंटों की धोखाधड़ी का शिकार हुए लोगों की मदद ना कर रहे होते हैं. बड़ी बात ये है कि इस मदद में उन्हें मिलने वाली सफलता का आंकड़ा बहुत ज्यादा है.

कैसे हुई शुरूआत?

आईये सबसे पहले जानते हैं कैसे हुई ये शुरूआत रौशन बताते हैं कि साल 2002 में वो मस्कट ओमान में थे. और वहां भारत के उत्तराखंड प्रांत के रहने वाले कुछ लोगों को एक बिरयानी हाउस में बंदी बना कर रखा गया था. क्योंकि रौशन भी उत्तराखंड से हैं तो उनसे पास सूचना आई, रौशन बताते हैं कि इस मामले में उनकी इंडियन एंबेसी से बहुत कहासुनी भी हुई. लेकिन आखिरकार वो उन चारों लोगों को भारत पहुंचाने में कामयाब रहे.  और तब से अब तक वो 900 से ज्यादा लोगों की सहायता कर चुके हैं.

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सख़्त कानूनों की वजह से आसान नहीं है ये काम

रौशन बताते हैं कि यूएई में कानून काफी सख्त हैं ये भी कारण है कि लोग चाहकर भी किसी की मदद को आगे नहीं आ पाते क्योंकि एक तो वो खुद भी प्रवासी होते हैं और दूसरा ये कि जिन लोगों की मदद की जानी है वो कहीं ना कही कानून ग़लत होते हैं. ऐसे में हमने रौशन से सवाल किया कि क्या उन्हे डर नहीं लगता? इस पर रौशन कहते हैं.

इंसानियत से बढ़कर कुछ भी नहीं है, और अगर मुझे कुछ हो भी जाएगा तो मुझे दुख नहीं होगा, क्योंकि अगर 100 लोगों के लिए मेरी जान भी जाती है तो मुझे गर्व होगा. मेरे स्वर्गीय माता-पिता को भी गर्व होगा.

अब हमने उनसे जानना चाहा कि किस तरह के मामले उनके सामने आते हैं और वो कैसे उनकी मदद करते हैं. हालांकि उन्होंने हमें ये बताया कि वो केवल भारतीयों की मदद नहीं करते. वो तो बस लोगों को मुश्किलों को देखते हैं फिर वो चाहे कोई भी हो किसी भी देश का हो. उनके कुछ नंबर वहां सार्वजनिक हैं और मुसीबत में फंसे लोग किसी तरह उनसे संपर्क करते हैं और फिर उनकी मुश्किलें रौशन की हो जाती हैं.

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कहां से आते हैं लोगों की मदद के लिए पैसे?

लेकिन बड़ा सवाल ये था कि वो लोगों की मदद के लिए इतना पैसा कहां से लाते हैं तो उन्होंने हमे बताया कि वो 120 लोगों के साथ  एक क्लीनिंग कंपनी चलाते हैं और उससे जो आमदनी होती हैं उससे वो लोगों की मदद करते हैं. हालांकि रौशन शादीशुदा नहीं हैं. वो कहते हैं कि उनका जीवन लोगों की मदद को ही समर्पित है. 

रौशन कहते हैं कि कई बार उन्हें मुसीबतों का सामना करना पड़ता है लेकिन उनकी भलमनसाहत देखकर कई बार संबंधित अधिकारी भी उनकी हर संभव सहायता करते हैं लेकिन कई बार उन्हें ये भी कहा जाता है कि आखिर वो क्यों मुसीबत मोल लेते हैं. इसके जवाब में रौशन कहते हैं बस जुनून हैं क्या करूं. लोगों के दुख हमसे साझा करते करते रौशन भावुक हो गए. वो कहते हैं

अपने लिए जीऊं, अपना पेट भरता रहूं बस ? क्या ये ही है ज़िंदगी? आप मुझे बताइये कि क्या हमारा लोगों के प्रति कोई फर्ज़ नहीं है?

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