मैल्विन भारत में कोलकाता के रहने वाले हैं. और वो ऑस्ट्रेलिया बतौर छात्र पहुंचे थे. लेकिन अपनी काबिलियत के चलते उन्होंने संघर्ष के एक दौर को बहुत जल्द ही पार कर लिया. हमने उनसे आईएबीसीए अवॉर्ड में उनकी उनकी उम्मीदवारी के बारे में सवाल किया. मैल्विन कहते हैं कि वो नहीं मानते कि वो इस अवॉर्ड के हक़दार हैं. लेकिन वो कहते हैं कि कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर यहां तक का सफ़र उनके लिए बहुत मायने रखता है. और वो मानते हैं कि इसके लिए उनकी कड़ी मेहनत को श्रेय दिया जाना चाहिए.
ये सफर नहीं था आसां
मैल्विन साल 2012 में ऑस्ट्रेलिया आए थे इससे पहले वो भारत में इंडिया स्टील अथॉरिटी के लिए काम करते थे. उन्होंने कहा कि यहां जब उन्हें पहली नौकरी मिली तो वो उसी कंपनी में दिल लगाकर काम करने लगे वो कहते हैं कि अब वो एक स्थापित कंपनी के निदेशक हैं लेकिन उस वक्त उनके लिए उनकी कम्यूनिकेशन क्षेत्र की पृष्ठभूमि भी काम आई. क्योंकि वो कंपनी के लिए बिज़नेस कम्यूनिकेशन भी देखते थे.
मैल्विन बताते हैं कि इन 6 सालों में उन्होंने कभी भी ये नहीं सोचा कि ये कंपनी उनकी नहीं है. और इसी का नतीजा है कि उन्हें सफलता मिलती गई. इसके बाद उन्होंने ज़रूरतमंद लोगों की मदद के लिए एक गैर-सरकारी संस्था भी बनाई
शिकायत नहीं मेहनत लाती है रंग
देश के बाहर सफलता की खोज में ऑस्ट्रेलिया आने वाले लोगों को वो कहते हैं कि लोगों को गीता का उपदेश याद रखना चाहिए जिसमें कहा गया है कि कर्मण्ये वाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन अर्थात कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो. मैल्विन कहते हैं कि एक दौर था जब वो आस्ट्रेलिया आए थे और सोचते थे कि आखिर क्यों वो एक सरकारी नौकरी छोड़कर यहां आ गए. वो कहते हैं कि
बिना शर्म के मैं ये कहना चाहता हूं कि कभी-कभी तो मैं रोता था कि क्या मैने ऑस्ट्रेलिया आकर ग़लत फैसला किया?
लेकिन उनकी मेहनत से वक्त बदला और बहुत जल्दी बदला. वो कहते हैं कि अगर आप ऑस्ट्रेलिया में आकर मेहनत करते हैं तो असफलताओं का दौर क्षणिक है. वो कहते हैं कि मैने कभी शिकायत नहीं की. मैल्विन को इस बात का मलाल है कि लोग यहां आकर भी यहां से ज्यादा भारत की राजनीति के बारे में जानने में ही रुचि रखते हैं. जबकि उनका पूरा ध्यान यहां होना चाहिए.
असफलताओं का दौर हर ज़िंदगी में महत्वपूर्ण है
हालांकि मैल्विन यहां आने वाले लोगों के लिए कुछ भी नहीं बदलना चाहते हैं. ना ही निराशा का वो दौर और ना ही असफलताओं का दौर. वो मानते हैं कि यहीं सब मिलकर एक व्यक्तित्व के बनने का कहानी बनाते हैं. और मेहनत से पायी गई सफलता ही आनंद की अनुभूति देती है. वो कहते हैं.
मैं कुछ भी बदलना नहीं चाहूंगा. ये यात्रा बहुत महत्व रखती है, पत्थर को काटकर ही मूर्ति बनती है और उसी को लोग पूजना शुरू करते हैं.




