फायर लाइन बनाकर लोगों को सुरक्षित करे सरकार- डॉ सुखबीर संधू

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Firefighters working to contain the Pelham Road Fire in Southern Tasmania, Monday, December 30, 2019 Source: AAP Image/Supplied by Tasmania Fire Service, Warren Frey

ऑस्ट्रेलिया में आग की त्रासदी के बीच अब सवाल ये है कि अब आगे के लिए क्या कदम उठाए जाएं कि आग के इस ख़तरे से बचा जा सके. यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया में सीनियर लैक्चरर और सस्टेनेबिलिटी एक्सपर्ट डॉक्टर सुखबीर संधू ने इस बारे में दिए हैं कुछ सुझाव, जिनमें फायर लाइन निर्धारित करना प्रमुख है.


ऑस्ट्रेलिया में आग की तबाही से होने वाले नुकसान का सही-सही आंकलन करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है. क्योंकि तबाही केवल वो नहीं है जो दिख रही है बल्कि इससे भी कहीं बड़ा नुकसान वो है, जो दिख नहीं रहा और जिसके प्रभाव आने वाले समय में भयानक हो सकते हैं. मसलन करोड़ों वन्य जीवों के मरने और लाखों हैक्टेयर ज़मीन में पेड़ पौधों के जलने से पारिस्थितिकी को हुआ नुकसान और इसके प्रभाव.

फिर भी एक आंकलन के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया को इससे कई बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है. 8.4 मिलियन हैक्टेयर से ज्यादा ज़मीन पर ये आग फैली थी. जहां करीब 2000 से ज्यादा घर जल ख़ाक हो गए 26 लोगों को अपनी ज़िंदगी गंवानी पड़ी.

इस तबाही ने तो पूरी दुनिया को झकझोरा ही है लेकिन ऑस्ट्रेलिया में अब चिंता और बढ़ गई है. चिंता इस बात की आखिर क्या होगा अगली गर्मी में उसके बाद के सालों में. क्या पूरा देश इस तरह की तबाही का इंतज़ार करता रहे. इस चिंता का सही और सटीक हल होने का दावा भले ही अभी कोई नहीं कर रहा हो लेकिन इस तरह के भीषण आग के सीज़न की पीछे जलवायु परिवर्तन की भूमिका से कोई इनकार भी नहीं कर रहा. अब सवाल ये कि तात्कालिक तौर पर हम क्या कर सकते हैं.

Dr Sukhbir Sandhu_ Senior Lecturer in Uni of SA
Source: Supplied / Dr Sukhbir Sandhu

इस प्रश्न पर कुछ सुझाव लेकर आई हैं यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया में सीनियर लैक्चरर और सस्टेनेबिलिटी एक्सपर्ट डॉक्टर सुखबीर संधू. वो कहती हैं कि ऑस्ट्रेलिया में ये कोई आम बात नहीं है. ये जो कुछ भी हुआ वो भयानक है. इतनी भीषण त्रासदी के बीच भी अगर कहीं से तर्क आता है कि ऑस्ट्रेलिया में तो आग हर साल लगती हैं लेकिन डॉक्टर संधू कहती हैं ये कहना अब इतना आसान नहीं है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन की वजह से परिस्थितियां तेज़ी से बदल रही हैं.

डॉक्टर संधू कहती हैं कि अगर हम इन परिस्थितियों तक पहुंचने में की गई ग़लतियों पर बात करें तो इसकी सूची बहुत लंबी हो जाएगी. लेकिन आज जब कि इस दिशा में तेजी से काम करने की ज़रूरत है तब हम प्राथमिकता के आधार पर कुछ लक्ष्य तय कर सकते हैं. वो कहती हैं कि सरकार को तत्काल फायर लाइन के कॉन्सेप्ट पर काम करना चाहिए

डॉक्टर संधू कहती हैं कि इन्श्योरेंस कंपनियों के पास तक इस बात का पूरा आंकड़ा होता है कि लोगों के रिहायश के हिसाब से कौन सी जगह सही है और कौन सी ख़तरनाक़. वो कहती हैं कि जलवायु परिवर्तन के बारे में हम रेत में सर गढ़ा कर नहीं रह सकते.

सरकार ये भले ही कह ले कि ऑस्ट्रेलिया को कुल उत्सर्जन दुनिया में काफी कम है लेकिन अगर आकड़ों को नज़दीक से देखे तो आपको पता चलेगा कि हमारा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विश्व की कतार में ऊपर के कुछ देशों में आता है.

डॉक्टर संधू के मुताबिक साल 2009 में जब ऑस्ट्रेलिया ने एक बेहद गंभीर आग का मंज़र देखा था. उसके बाद से सरकारों ने सबक ज़रूर लिया है. लेकिन अभी भी नहीं लगता कि हम पूरी तरह से तैयार हैं. वो मानती हैं कि आग की स्थिति से निपटने के लिए हम कितनी भी तकनीकी तौर पर सक्षम हो जाएं लेकिन बैक बर्निंग को लेकर आदिवासी समुदाय का जो अनुभव है वो बेजोड़ है और उसका ज़रूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए.


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