डॉक्टर मानते हैं कि अगर डिमेंशिया जैसी बीमारी अगर समय रहते पकड़ में आ जाए तो इसका बेहतर इलाज हो सकता है. लेकिन क्या इसका आरंभिक अवस्था में इसका पता लगा पाना इतना आसान है? हालांकि वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं कि वो इस बीमारी का डेटा इकट्ठा करके वो कारनामा कर दिखाएं जिससे कि किसी शख्स में इस बीमारी को 10 या 15 साल पहले पकड़ा जा सके.
नए अध्ययन से क्या चाहते हैं वैज्ञानिक
वैज्ञानिक इस दिनों एक शरीर में पहनी जाने वाली एक तकनीक का इस्तेमाल करके एक वैश्विक आंकड़े का अध्ययन करने की शुरूआत कर रहे हैं. कोशिश की जा रही है कि क्या लक्षणों के दिखने से पहले डिमेंशिया जैसी बीमारी का किसी इंसान में 10 या 15 साल पहले पता लगाया जा सकता है?
इस प्रक्रिया में रोगियों के लक्षणों में सूक्ष्म परिवर्तनों का पता लगाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग किया जाएगा. चलिए पहले समझते हैं डिमेंशिया होता क्या है. वेस्टमीड मेडिकल सेंटर से डॉक्टर मनमीत मदान हमें बता रहें हैं मोटे तौर पर डिमेंशिया दो तरह से होता है. पहला बढ़ती उम्र के कारकों से और दूसरा डायबिटीज़ और कुछ इस तरह की बीमारियों की वजह से.
किस कदर प्रभावित होते हैं परिवार
अब मिलिए शाहीन लैरियाह से जिनकी ज़िंदगी को डिमेंशिया जैसी बीमारी ने पिछले 10 सालों में बुरी तरह प्रभावित किया है. उनके पिता को वास्कुलर डिमेंशिया था और साल 2017 में उनका देहांत हो गया था. लेकिन शाहीन और उनके परिवार के लिए दर्द इतना ही नहीं था. उनकी को दुर्लभ फ्रंटल टैम्पोरल डिमेंशिया हो गया. शाहीन जो कि एक कैमिकल इंजीनियर थीं. उन्हें अपनी मां की देखभाल करने के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी.
हालांकि शाहीन की मां पहले भी डॉक्टरों के पास जाती रहीं थीं. लेकिन कई सालों तक डिमेंशिया का पता नहीं चल पाया. साल 2011 में डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि उनकी मां के एक दुर्लभ तरह का डिमेंशिया है.
आखिर क्यों जल्द डिमेंशिया का पता नहीं चलता
आखिर क्यों ऐसा हुआ कि शाहीन की मां का डिमेंशिया सही समय पर नहीं पकड़ में आ सका. इसके कई कारण हो सकते हैं. कुछ कारणों के बारे में बताते हुए डॉक्टर मनमीत मदान कहते हैं कि डिमेंशिया जैसे मामलों में अक्सर अकेले रह रहे लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं. क्योंकि उनके बारे में कोई ये बताने वाला नहीं होता कि घर पर या बाकी जगहों पर उनका व्यवहार कैसा है. वहीं खुद उन्हें अपने बदलते व्यवहार के बारे में अहसास नहीं होता.
ज़ाहिर तौर पर शाहीन जैसे कई लोग हैं कि जिन्हें उम्मीद है कि एल्ज़ाइमर्स रिसर्च यूके, ट्यूरिंग इंस्टीट्यूट और दूसरे कई दूसरे संगठनों द्वारा शुरू किए गए नए डेटा स्टडी से डॉक्टर डिमेंशिया का काफी पहले पता लगाने में सक्षम हो पाएंगे. ताकि शरीर को नुकसान पहुंचाने से पहले उसका निदान किया जा सके.
अगर मिली सफलता तो...
डॉक्टर मानते हैं कि डिमेंशिया की बीमारी में दी जाने वाली कुछ दवाएं असर नहीं करती हैं क्योंकि उन्हें दिए जाने में देर हो चुकी होती है. माना जा रहा है कि ये दवाएं डिमेंशिया को टालने में सहायक हो सकती हैं अगर इन्हें डिमेंशिया जैसी बीमारी की वजह से दिमाग को पहुंचने वाले नुकसान से पहले मरीज़ों को दिया जा सके.
अगर देखा जाए तो स्मार्टवॉच जैसी तकनीक़ से हमारी ज़िंदगी के बारे में वैसे ही एक बड़ी संख्या में आंकड़े जुटाए जा रहे हैं जैसे कि हमारा हार्ट रेट, हम कितनी कसरत करते हैं हम कितनी नींद लेते हैं साथ ही कई और जानकारियां भी. अल्ज़ाइमर्स यूके के शोध निदेशक कैरोल रुटलैज का कहना है कि वो इकट्ठा किए गए आंकड़ों के ज़रिए एक बड़ा सूचना बैंक बनाना चाहते हैं.. जिसका प्रयोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में करके मरीज़ के स्वास्थ्य के बारे में भविष्यवाणी की जा सके.
इस योजना के पहले चरण में उन 100 हज़ार लोगों के आंकड़े प्रयोग में लाए जाएंगे. जो कि पहले से ही डिमेंशिया की बीमारी होने के ख़तरे से जूझ रहे हैं. उद्देश्य ये है कि आगे इस अध्ययन में करीब 1 मिलियन तक की संख्या में लोगों को शामिल किया जाए. ऐसे लोग जो कि अपना जैविक नमूने दे सकें और साथ की उनके आंकड़ों को इस्तेमाल करने की सहमति दे सकें. ज़ाहिर तौर पर आंकड़े एकत्रित करने की ये प्रक्रिया काफी बड़ी है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतिम विश्लेषण में वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग उस पैटर्न को पहचानने के लिए किया जाएगा. जो अल्ज़ाइमर्स जैसे डिमेंशिया की स्थिति को शुरुआती चरण में ही स्पष्ट कर देगा. द एलन ट्यूरिंग इन्स्टिट्यूट में हैल्थ एंड मेडिकल साइंसेज़ में प्रोग्राम डायरेक्टर प्रोफेसर क्रिस्टोफर होल्म्स इस बात को लेकर काफी आशावादी हैं कि क्या ये नई तकनीक़ डिमेंशिया के उपचार में एक क्रांतिकारी बदलाव लाएगी.
आपको बता दें कि डिमेंशिया से दुनिया भर में 50 मिलियन से ज्यादा लोग प्रभावित हैं ऑस्ट्रेलिया में डिमेंशिया, बीमारियों से होने वाली मौतों में दूसरा सबसे बड़ा कारण है.





