ऑस्ट्रेलिया के पहले सामाजिक समावेश सूची यानी सोशल इन्क्लूज़न इंडेक्स में खुलासा हुआ है कि देश के एक चौथाई लोगों का मानना है कि उनका कम से कम सप्ताह में एक बार अनादर होता ही है. सर्वे में ये बात भी सामने आई है कि करीब इतनी ही संख्या में यानी एक चौथाई आस्ट्रेलियाई लोगों ने करीब पिछले दो साल के अंतराल में बड़े भेदभाव का सामना किया है जिसमें कि बैंक से ऋण ना मिलना, और नौकरी में उनकी अनदेखी शामिल है.
आपको बता दें कि ये रिपोर्ट मोनाश विश्वविद्यालय के संस्टेनेबल डेवलेपमेंट इंस्टट्यूट की एक शाखा बिहेवियर वर्क्स ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने तैयार की है जिसे मीज़रिंग सोशल इन्क्लूज़न नाम दिया गया है. एक शोधकर्ता प्रोफेसर लिएम स्मिथ का कहना है कि ये सूचकांग पिछले कुछ वर्षों के सर्वेक्षणों के आंकड़ों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.
इस सूचकांग में पांच बातों को 100 के स्कोर के मापदंड पर आंका गया है. जिनमें पूर्वाग्रह और भेदभाव की अनुपस्थिति, सामंजस्य और देखभाल, संपर्क और मित्रता, स्वेच्छा से मदद और एकजुटता की वकालत शामिल है. दिसंबर 2018 में आस्ट्रेलिया ने इन मापदडों में 100 में से 62 अंक हासिल किए, जो कि साल 2017 के दिसंबर महीने से एक अंक ज्यादा था. हालांकि मई 2017 में ये ठीक 62 अंक पर ही था. बिहेवियर वर्क्स की शोधकर्ता और इस रिपोर्ट की सह-लेखक क्विन जो का कहना है कि ये रिपोर्ट खासतौर पर पूर्वाग्रह पर केंद्रित है.
पूर्वाग्रह की बात करें तो करीब 27 फीसदी आस्ट्रेलियाई लोगों में धार्मिक और नस्लीय अल्पसंख्यकों के प्रति बहुत अधिक पूर्वाग्रह पाया गया है. रिपोर्ट के इस हिस्से ने काउंसिल ऑफ ऑस्ट्रेलिया की फैडरेशन ऑफ एथनिक कम्यूनिटीज़ के सीईओ मोहम्मद अल खफाजी बिल्कुल भी नहीं चौंकाया. उनका कहना है कि भेदभाव को कम करने के लिए आपसी सामंजस्य के कार्यक्रमों में ज्यादा निवेश की ज़रूरत है.
ठीक इसी रिपोर्ट की तरह प्रोफेसर स्मिथ भी पाते हैं कि करीब 25 फीसदी आस्ट्रेलियाई आदिवासी लोगों के प्रति काफी हद तक पूर्वाग्रह रखते हैं. आदिवासी और टौरस स्ट्रेट आइलैंडर लोगों की बात करें तो करीब 54 फीसदी लोग सप्ताह में एक बार भेदभाव महसूस करते हैं. जो कि साल 2017 के दिसंबर महीने से 14 फीसदी ज्यादा है. हालांकि सुश्री झाओ कहती हैं कि हालात इतने भी बुरे नहीं हैं क्योंकि सर्वें में शामिल आधे लोग मानते हैं कि जब भी उन्होंने किसी को भेदभाव का शिकार होते देखा है तो उन्होंने मामले में हस्तक्षेप किया है.
करीब दो दशक पहले दक्षिण अफ्रीका से ऑस्ट्रेलिया आए अजित सोमर्स कहते हैं कि उन्हें भी यहां पर भेदभाव का सामना करना पड़ा वो कहते हैं कि वो आज भी यहां आदिवासी लोगों की उपेक्षा देखते हैं तो उन्हें पीड़ा होती है. हालांकि वो मानते हैं कि स्थिति सुधर रही है. और लोग आगे आ रहे हैं.
श्यामला ईश्वरन शास्त्रीय नृत्य में पारंगत हैं. वो कहती हैं कि उन्हें भी बचपन में कई बार नस्लील भेदभाव का शिकार होना पड़ा था. श्यामला मानती हैं कि सिडनी जैसे शहर में ही सामुदायिक तौर पर इलाके बंटे हुए हैं. और लोग किसी दूसरे समुदाय के इलाके में रहना पसंद नहीं करते हैं.
अब शोधकर्ता ये उम्मीद कर रहे हैं कि समय के साथ सामाजिक समावेशन के लिए आस्ट्रेलिया के दृष्टिकोष को सही ढंग से चित्रित करने के लिए सटीक डेटा एकत्र किया जाएगा. उधर मोहम्मद अल खफाजी मानते हैं किये रिपोर्ट सरकार को कारगर कदम उठाने में सहायता करेगी.




