गैंगस् ऑफ वासीपुर से अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले, पंकज त्रिपाठी, एक बड़े ही सरल व्यक्तित्व के मालिक हैं और उनके साथ बातचीत करने में कहीं भी बनावटीपन नहीं लगता।
उनके लिये बिना संदेह यह कहा जा सकता है कि वह न सिर्फ एक सरल स्वभाव के ही व्यक्ति हैं बल्कि आदर्शों को पू्र्ण रूप से स्वयम् पर लागु भी करते हैं। बातचीत के दौरान, फिल्म बरेली की बर्फी के अपने चरित्र अनुसार, वह अपने मधुर स्वभाव का बराबर परिचय देते जाते हैं।
अपने स्तर पर थियेटर की दुनिया से निकल कर, नेशनल स्कुल ऑफ ड्रामा, दिल्ली से शिक्षण लेकर वह अपनी पहचान बनाने आ पहुँचे मुम्बई नगरी, जहाँ फिल्म रन से अपने करीयर की शुरुवात की। संघर्ष के कुछ वर्षो के बाद फिल्म गैंगस् ऑफ वासीपुर से अपनी एक अलग पहचान बनायी। यूँ, इस फिल्म में रोल के लिये वह निर्देशक की पहली पसंद नहीं थे। वह बताते हैं कि इस रोल के लिये 8 घंटे तक ऑडीशन चला । उस समय तक लिखे जा चुके सभी संवादों पर उन्होंने अपनी कला का परिचय दिया।
अग्निपथ, मसान, सिंघम रिटर्न, अनारकली ऑफ आराह, निल बैटरी सन्नाटा, न्यूटन, बरेली की बर्फी, गुड़गाँव जैसी कई पिल्मों में अलग अलग चरित्र निभाने वाले पंकज त्रिपाठी की अपनी पसंद का रोल क्या है तो इस पर वह कहते हैं कि उन्हें एक सीधे सादे चरित्र को निभाना अच्छा लगता है।
... जैसे कि फिल्म तीसरी कसम में राजकपूर का किरदार था।
प्रसिद्धी और पहचान ने उन्हें बिल्कुल भी नहीं बदला है। आज भी वह अपने गाँव से जुड़े हैं। वह वहाँ जाते हैं। वहाँ की स्वच्छ निर्मल हवा, वहाँ का दृष्य उनके मन में बसा हुआ है। उस छोटे से गाँव से मुम्बई नगरी कर का सफर उनहें एक स्वप्न की तरह लगता है।
अपने पसंदीदा कलाकारों के बारे में बताते हुये वह ओम पुरी को याद करते हैं। नसीरुद्दीन शाह, रजनीकांत , नाना पाटेकर जैसे कलाकारों और अपने साथ काम करने वाले हर कलाकार से वह प्रभावित होते हैं, उनके कौशल को सीखना चाहते हैं।
दिल्ली के नेशनल स्कुल ऑफ ड्रामा के दिनों को याद करते हुये कहते हैं कि वह अपने शिक्षकों के प्रति बार बार आभारी होते हैं कि चाहे उस समय अहसास नहीं होता कि क्या सीख रहे हैं, पर आज उन सबकी सीख ही काम आ रही है।
वह कहते हैं कि वह सदैव से ही एक अच्छे सिनेमा के प्रति समर्पित हैं और चाहते हैं कि वह दर्शकों के लिये अच्छी अच्छी फिल्में करें जो मनोरंजन के साथ साथ यादकार भी रहें।
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