ऑस्ट्रेलिया के बहार पैदा हुए लाखों लोग आज ऑस्ट्रेलिया को अपना घर मानते हैं
2011-12 में करवाए गए जनसँख्या आंकलन में भारत से आने वाले लोग ऑस्ट्रेलिया के permanent माइग्रेशन प्रोग्राम का 15.7 प्रतिशत हिस्सा थे - यह प्रवास का सबसे बड़ा स्रोत था!
परन्तु ऑस्ट्रेलिया के यह परमानेंट रेसिडेंट्स यहाँ मतदान करने का अधिकार नहीं रखते.
एक तर्कसंगत प्रश्न जो यहाँ पैदा होता है वह है की क्या ऑस्ट्रेलिया के इन परमानेंट रेसिडेंट्स को मतदान का अधिकार मिलना चहियहए?

इलेक्शन वाच के डिप्टी डायरेक्टर Heath Pickering के अनुसार "लोक-तंत्र का मूलभूत सिद्धांत ही यह है की समाज के सभी लोगों को उनको प्रभावित करने वाले मुद्दों पर मत या राय का अधिकार हो."
भारतीये मूल के कउंसल्लोर गौतम गुप्ता, जो की आज कल Wyndham कौंसिल के एक्टिंग मेयर के पद पर कार्यरत हैं, मानते हैं की “मतदान का अधिकार बेहद जरूरी है क्यूंकि ऑस्ट्रेलिया के परमानेंट रेसिडेंट्स यहाँ पर आयकर भरते हैं तथा वह सभी सुविधाएं और सेवाएं इस्तेमाल करते हैं जो की एक नागरिक का अधिकार है. इसलिये उन्हें भी यह अधिकार होना चहियहए की उनका आयकर कैसे और कहाँ इस्तेमाल किया जा रहा है!”

भावना जी की ऑस्ट्रेलिया में लगभग तीन वर्ष पहले आई कहती हैं की “ऑस्ट्रेलिया के परमानेंट रेजिडेंट होने के बावजूद भी, यहाँ काम करने, आयकर भरने, और स्कूल अथवा मेडिकेयर जैसी सुविधाओं का प्रयोग का अधिकार होने पर भी मतदान का अधिकार न मिलना इन्साफ नहीं है!”
Department of Immigration and Border Protection की रिपोर्ट के अनुसार हर वर्ष हज़ारों लोगों की ऑस्ट्रेलिया में परमानेंट रेजिडेंट बनने के आवेदन पारित किये जाते हैं.

धर्मेश जो अपने जीवन का काफी समय साउथ कोरिया में बिता चुके हैं और अब ऑस्ट्रेलिया के नागरिक हैं मानते हैं की “परमानेंट रेसिडेंट्स को मतदान का अधिकार देना ऑस्ट्रेलिया के फेयर गो सिद्धांत का प्रतीक होगा! इस अधिकार के मिलने से परमानेंट रेसिडेंट्स भी नागरिकों की तरह कौंसिल राज्य तथा फ़ेडरल स्तर पर अपनी राय दे सकेंगे.”
इस बारे में और अधिक विचार जानने के लिये एसबीएस हिंदी ने 'इंडियन्स इन – मेलबोर्न, पर्थ, डार्विन, ब्रिस्बन, और ऑस्ट्रेलिया' नामक फेसबुक पेज पर एक पोल सर्वेक्षण करवाया.

एसबीएस हिंदी का यह पोल सर्वेक्षण चौंकाने वाला था - 50 प्रतिशत से भी अधिक लोगों ने परमेनेंट रेसिडेंट्स को मतदान के अधिकार का विरोध किया!
कार्तिक अरासु जो की 2016 के चुनावों में विक्टोरिया से सिनेट के लिये निर्दलिये उम्मीदवार हैं मानते हैं की “इसमें कोई शक नहीं की परमानेंट रेसिडेंट्स ऑस्ट्रेलिया का बेहद जरूरी हिस्सा हैं परन्तु उन्हें ऑस्ट्रेलिया की राजनीती को समझने का वक़्त चहियहए क्यूंकि उनका एक गलत मत पपूरा राजनितिक परिदृश्य बदल सकता है!”
सक्षम कत्याल जो हाल ही मैं ऑस्ट्रेलिया के परमानेंट रेजिडेंट बने हैं भावनात्मक रूप से गौतम और धर्मेश से सहमत हैं परन्तु सैद्धान्तिक रूप से इस विषय पर कार्तिक का समर्थन करते हैं.

सक्षम के अनुसार “मतदान का अधिकार दिया जाना एक बड़ा मुद्दा है और ऐसा काफी बहस के बाद और सोच समझ कर ही करना होगा.”
इसके साथ ही कई अन्य लोगों की तरह सक्षम भी यह मानते हैं की ऑस्ट्रेलिया में आकर बस रहे नए प्रवासियों को पहले यहाँ के माहौल और राजनीती को समझ कर ऑस्ट्रेलिया के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शानी चहियहए!
इसके साथ ही एसबीएस हिंदी द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण पोल में कई भारतीये लोगों ने टिपण्णी छोड़ी की यह लोकतान्त्रिक तरीका नहीं है
परन्तु लोकतंत्र का तो अर्थ ही लोगों के लिये, लोगों द्वारा, और लोगों की सरकार होता है

Heath Pickering बताते हैं की लोकतंत्र में कौन मतदान का अधिकार रखता है इसमें भी काफी बदलाव आएं हैं
उदाहरण के लिए इंग्लैंड में सिर्फ जमींदारों को ही मतदान का अधिकार था वहीँ अमेरिका और साउथ अफ्रीका में अश्वेत नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त नहीं था और जब ऑस्ट्रेलिया में मतदान शुरू हुए तो सिर्फ पुरुषों को यह अधिकार प्राप्त था स्त्रियों और इंडिजेनस आस्ट्रेलियावासियों को यह अधिकार काफी देर से प्राप्त हुआ!
साधारण भाषा में यदि बोलेन तो लोकतंत्र में किसको मत का अधिकार है यह बात पत्थर पर लिखी लकीर नहीं है.

आज लगभग चालीस से ज्यादा देशों ने अपने यहाँ रह रहे non-citizens या परमानेंट रेसिडेंट्स को मतदान को अधिकार किस न किसी रूप में देने की कोशिश पर बल दिया है
Heath Pickering के अनुसार “मूलभूत रूप से मतदान का अधिकार समाज में रह रहे हर व्यक्ति को दिया जाना चहियहए क्यूंकि वह समाज का हिस्सा हैं.”




