12 साल की उम्र में स्कूल छोड़ने वाले उद्देश्य सचान ने ठान लिया था कि आर्थिक या पारिवारिक मजबूरियों की वजह से कोई बच्चा पढ़ाई से वंचित न रहे। आज वो कानपुर में एक निःशुल्क स्कूल चलाते हैं, जहां झुग्गी-बस्तियों के बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं और स्कूल से जुड़ने का नया अवसर पा रहे हैं।
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