इस साल के ऑस्कर बीत चुके हैं. विवादों की धूल बैठ चुकी है. लोग आगे बढ़ गए है. लेकिन एक किस्सा है जो वहीं खड़ा है जहां आधी सदी पहले था. भारत की फिल्म मदर इंडिया का किस्सा. इस फिल्म के निर्देशक महबूब खान का किस्सा. सुनिये सिनेमा के जानकार और लेखक डॉ. विक्रांत किशोर के साथ कुमुद मीरानी की यह खास बातचीत.
डॉ. विक्रांत किशोर ने महान फिल्मकार महबूब खान के पोते अफजल खान से बातचीत की थी. इस बातचीत में महबूब और मदर इंडिया के बारे में कई दिलचस्प बातें पता चलीं. जैसे कि मदर इंडिया के रूप में अपना सपना पूरा करने के लिये महबूब खान भारी कर्ज में डूब गए थे. उनके पास इतना पैसा भी नहीं था कि वह अमेरिका जाकर ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई फिल्म का प्रचार कर सकें. मदर इंडिया उनके लिए सिर्फ फिल्म नहीं थी बल्कि उनके दिल का टुकड़ा था. इसलिए जब 1958 मदर इंडिया विदेशी भाषा फिल्म की कैटिगरी का ऑस्कर जीतने से चूक गई तो महबूब का दिल टूट गया. उन्हें दिल का दौरा पड़ा.
डॉ. किशोर ने महबूब साहब के बारे में और भी कई जानकारियां दी हैं और बात की इस महान फिल्मकार के महीन काम के बारे में कि कैसे घोड़े के खुर में नाल ठोकने वाला एक लड़का हिंदी सिनेमा का सरताज बन गया.




