विनोद खन्ना का जन्म सन् 1946 में पेशावर के एक व्यवसायी परिवार में हुआ|
एक साल बाद, 1947 में उनका परिवार बम्बई आकर बस गया|
पांच दशक लम्बे करियर में विनोद खन्ना ने सौ से ज्यादा फिल्में कीं|
उनकी स्क्रीन पर उपस्थिति इतनी बड़ी थी कि कई बार मुख्य किरदार न होते हुए भी वे अपनी ओर ज्यादा ध्यान आकर्षित करते थे|
सन् 1968 में सुनील दत्त ने कॉलेज में पढ़ने वाले युवा विनोद को चीन्हा और मन के मीत फिल्म के लिए चुन लिया|
ये विनोद खन्ना की पहली फिल्म थी, और पहली ही फिल्म से उन्होंने खलनायक के रूप में अपनी एक अलग छाप छोड़ दी|
विनोद खन्ना उन चुनिन्दा अभिनेताओं में थे जिन्हें नायक और खलनायक, दोनों के रूप में एक सामान मोहब्बत मिली|
1971 में आई फिल्म मेरा गाँव मेरा देश में विनोद खन्ना ने डाकू की भूमिका ऐसी निभाई कि कितने ही ज़हन डाकू की कल्पना में सीधे उनका चेहरा सोचने लगते|
साल 1971 में ही आई फिल्म मेरे अपने और 1973 में आई फिल्म अचानक ने उन्हें बतौर सीरियस अभिनेता पूरी तरह स्थापित कर दिया था|
विनोद खन्ना के अभिनय की एक ख़ास बात यह भी है कि वे जितनी सहजता से एक्शन हीरो के किरदार निभाते थे, उसी आसानी से पर्दे पर रोमांस भी जिंदा कर देते थे|
वे उस पारम्परिक पंजाबी की जीती-जाती मिसाल थे जो गर्मजोशी, मर्दानगी और मोहब्बत से लबरेज़ था|
यही वजह थी कि उनकी फैन-फोल्लोविंग में औरतें और मर्द बराबर थे|
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत कम लोग ऐसे हुए जिनकी स्क्रीन प्रेसेंस न ही केवल अपनी अभिनेत्रियों, बल्कि सह-अभिनेताओं के साथ भी यादगार रहीं|
विनोद खन्ना एक ऐसे कलाकार थे जिनके हिस्से उस दौर की सबसे ज़्यादा मल्टी-स्टारर फिल्में आयीं|
सत्तर-अस्सी के दशक में आने वाली कुछ बड़ी फिल्में जैसे मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर अंथनी, हेरा फेरी, शंकर शंभू, दयावान- सभी बेहद चमकीले सितारों से भरी हुईं थीं, पर याद इन्हें विनोद खन्ना की फिल्मों की तरह ही किया जाता है|
इन सब फिल्मों को जो एक बात जोड़ती है वो यह कि इन फिल्मों में विनोद खन्ना के सारे किरदारों ने दोस्ती की मिसालें खड़ी कीं|
आज की भाषा में कहें तो वे न ही केवल रोमांस, बल्कि ब्रोमांस के भी बादशाह थे!
1981 में आई फिल्म कुर्बानी में विनोद खन्ना की जोड़ी जितनी ज़ीनत अमान के साथ सराही गयी, उतनी ही फ़िरोज़ खान के साथ भी|
फ़िरोज़ खान के साथ तो उनकी जोड़ी उस समय का सक्सेस फार्मूला मान ली गयी थी|
सत्तर के उतरते दशक में उनके जीवन में एक साथ दो बड़े सदमें आये|
पहले चचेरे भाई, और फिर माँ को खो देने के दोहरे दुःख ने उन्हें तोड़ दिया और वे फिल्मों को अलविदा कह, अपने अध्यात्मिक विकास के लिए अमरीका चले गये|
वहां आठ साल तक उन्होंने ओशो के आश्रम में सेवा की|
जब वे भारत लौटे, तो न उनके पास पैसे थे, न घर|
उन्होंने फिर एक बार फिल्मों में काम किया और ऑडियंस ने उन्हें हाथोंहाथ लिया|
विनोद खन्ना ने एक जीवन में कई जीवन जिए|
फिल्मों से उनका रुख राजनीति की ओर हुआ और साल 1998 में वे गुरदासपुर से सांसद हुए, और आगे जाकर वाजपयी सरकार में मंत्री भी|
साल 2017 में यह सितारा हमें हमेशा के लिए अलविदा कह गया|
उनके जाने के बाद उन्हें दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाज़ा गया|
विनोद खन्ना अपने पीछे अपनी जो कभी न हार मानने के जज़्बे की कहानी छोड़ गये वो अपने आप में एक प्रेरणा है|




