भारत में चीनी के अतिरिक्त भंडारण पर आस्ट्रेलिया की शिकायत की सुनवाई करेगा WTO

A horse cart rider transposrts sugarcane during the COVID-19 lockdown

A horse cart rider transposrts sugarcane in Mathura. Source: ANI/KK Studio

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूं तो कृषि व्यापार को बढ़ाने के लिए काफी कोशिशें की जा रही हैं. और इसे मूर्त रूप देने के लिए एक साझा रिपोर्ट भी तैयार की जा रही है. लेकिन कृषि उत्पाद से जुड़े एक मामले को लेकर दोनों देशों की सरकारें विश्व व्यापार संगठन यानी WTO में आमने-सामने हैं.


खबर यह है कि ब्राज़ील, ग्वाटेमाला और ऑस्ट्रेलिया ने भारत पर साल 2018 में चीनी के अतिरिक्त भंडारण का आरोप लगाया था. इन देशों का आरोप है कि भारत के अतिरिक्त भंडारण से विश्व बाज़ार को आशंका है कि यह चीनी एक दिन बाज़ार में उतरेगी. इसी आशंका से विश्व बाज़ार में चीनी के दाम कृत्रिम तौर पर कम हो गए हैं जिसका ख़ामियाज़ा इस देशों को भुगतना पड़ रहा है।


मुख्य बातें:

  • ब्राज़ील, ग्वाटेमाला और ऑस्ट्रेलिया ने भारत पर साल 2018 में चीनी के अतिरिक्त भंडारण का आरोप लगाया था.
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) अब इन देशों की शिकायत पर सुनवाई करेगा. 
  • भारत का कहना है कि वह अपने किसानों को कोई ख़ास सब्सिडी नहीं दे रहा और न ही चीनी के अतिरिक्त भंडार को विश्व बाज़ार में उतारने की मंशा रखता है.
अब इस देश की मांग पर विश्व व्यापार संगठन में इसकी सुनवाई शुरू हो रही है और माना जा रहा है कि इस पर कोई फैसला साल 2021 की पहली तिमाही में आ सकता है.

प्रोफेसर ब्रजेश सिंह वेस्टर्न सिडनी विश्वविद्यालय के ग्लोबल सेंटर फॉर लैंड बेस्ड इनोवेशन के डायरेक्टर हैं.
Prof Brajesh Singh
Prof Brajesh Singh, Director, Global Centre for Land-Based Innovation. Western Sydney University Source: Supplied/ Prof Brajesh Singh
प्रोफेसर ब्रजेश कहते हैं, "यह पूरा विवाद भारत में चीनी के अतिरिक्त भंडारण की वजह से शुरू हुआ है. आपत्ति उठाने वाले देशों का कहना है कि भारत में अतिरिक्त भंडार से विश्व बाज़ार को लगता है कि ये चीनी कभी ना कभी बाज़ार में आएगी और इसी आशंका से अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी का भाव गिर रहा है. ये देश भारत पर अपने गन्ना किसानों को ज्यादा सब्सिडी देने का आरोप लगा रहे हैं."

सुनिए, क्या कहते हैं प्रोफेसर ब्रजेश सिंहः

भारत के पक्ष पर बोलते हुए प्रोफेसर ब्रजेश कहते हैं, "भारत का कहना है कि जिसे किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी बताया जा रहा है वह दरअसल किसानों को मिलने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य है जो कि किसी भी प्रमुख फसल पर दिया जाता है."

वह कहते हैं कि दरअसल भारत चीनी का निर्यात नहीं करता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अच्छे मानसून और गन्ने की एक ख़ास किस्म की वजह से चीनी का अतिरिक्त उत्पादन हुआ है, जो कि भारत में चीनी की खपत से कहीं अधिक है. इसलिए भारत के पास चीनी की अतिरिक्त भंडारण हो गया है. 

भारत सरकार का कहना है कि अगर वह किसानों से चीनी नहीं खरीदती है तो इसका बुरा असर सीधे तौर पर किसानों पर पड़ेगा.
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प्रोफेसर ब्रजेश इस मामले के विश्व व्यापार संगठन में जाने को चिंताजनक नहीं मानते हैं. वह कहते हैं कि ये संगठन बना ही इसलिए है. और उन्हें उम्मीद है कि इस मसले का भी कोई अच्छा हल निकलेगा.


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