वो कहती हैं कि ठहरे हुए पानी में दुर्गंध आने लगती है... ये पानी की रवानगी ही है जो उसे ताज़ा और जिंदा बनाए रखती है. ऐसे ही हैं हमारे विचार, हमारी सोच और समाज में होने वाले बदलाव.. ज्योत्सना ज्योति उन विचारों के ठहरे पानी में अपने नाटक “अंधी दौड़” का एक कंकड़ मारना चाहती जो हम अपने अतीत से यहां लेकर आए हैं और बदले माहौल, बदले समाज में भी उन्हें बिल्कुल बदलना नहीं चाहते. ये नाटक ज़िंदगी को बदलावों को आवाज़ देता है, पहले न्यूज़ीलैंड और अब ऑस्ट्रेलिया में हिंदी के लिए अपनी कलम को समर्पित करने वाली ज्योतसना इस नाटक के बारे में कुछ बता रही हैं. तो ज़रा आप भी सुनिए...
वो कहती हैं कि ठहरे हुए पानी में दुर्गंध आने लगती है... ये पानी की रवानगी ही है जो उसे ताज़ा और जिंदा बनाए रखती है. ऐसे ही हैं हमारे विचार, हमारी सोच और समाज में होने वाले बदलाव.. ज्योत्सना ज्योति उन विचारों के ठहरे पानी में अपने नाटक “अंधी दौड़” का एक कंकड़ मारना चाहती जो हम अपने अतीत से यहां लेकर आए हैं और बदले माहौल, बदले समाज में भी उन्हें बिल्कुल बदलना नहीं चाहते. ये नाटक ज़िंदगी को बदलावों को आवाज़ देता है, पहले न्यूज़ीलैंड और अब ऑस्ट्रेलिया में हिंदी के लिए अपनी कलम को समर्पित करने वाली ज्योतसना इस नाटक के बारे में कुछ बता रही हैं. तो ज़रा आप भी सुनिए...