ये कहानी है मनिंदरजीत कौर की. एक हादसे ने उनकी जिंदगी ऐसी बदल दी कि आज तक वो जख्म नासूर बनकर उनके मन को कचोटता है. इसी नासूर को मनोवैज्ञानिक डिप्रेशन या अवसाद कहते हैं. मनिंदर के साथ ऐसा क्या हुआ? वह बताती हैं, “मेरा डिप्रेशन पांच साल शुरू हुआ जब हमने मेरी बड़ी बहन को खो दिया. मैं घर में सबसे छोटी हूं और वह मेरे लिए मां जैसी थी. मेरा ख्याल रखती थी. मेरा साथ देती थी. उसके चले जाने के बाद मैं एकदम अकेली हो गई. मुझे लगा कि ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ.”
डिप्रेशन में होना क्या होता है, यह शब्दों में शायद ही कोई समझा पाए. आप उदास रहते हैं. आप अकेले रहते हैं. आप चुप रहते हैं. और सामने वाले को आपकी यह उदासी, अकेलापन और चुप्पी बेवजह लगती है. लोगों को लगता है कि आपको ऐसा तो महसूस नहीं होना चाहिए पर आप उन्हें समझा ही नहीं पाते. और तब आप और ज्यादा अकेले हो जाते हैं. मनिंदर के साथ भी यही हो रहा था. वह अकेली होती जा रही थीं. उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और खुद को घर में कैद कर लिया. वह कहती हैं, “मेरा किसी से बात करने का मन नहीं करता था. किसी से मिलने का मन नहीं करता था. पहले मैं बहुत सामाजिक थी, सबसे मिलती जुलती थी. लेकिन उस घटना के बाद मैंने खुद को घर में कैद कर लिया. छह महीने तक तो मैं घर से बाहर ही नहीं निकली.”
डिप्रेशन एक सामान्य बीमारी है. एक रोग जो कभी भी हो सकता है, किसी को भी हो सकता है. बहुत साधारण भाषा में डॉक्टर समझाते हैं कि जैसे बुखार हो सकता है, जैसे सिर दर्द हो सकता है वैसे ही डिप्रेशन भी हो सकता है. इसलिए बुखार होने पर या दर्द होने पर जब आप डॉक्टर के पास जाते हैं तो डिप्रेशन में भी जाना चाहिए. लेकिन हम अक्सर इस बीमारी को ऐसे नहीं समझते. इसे दूसरों से छिपाते हैं. डॉक्टर के पास जाना तो दूर की बात अपनों से कहने में भी डरते हैं. मनिंदर ने भी ऐसा ही किया. वह बताती हैं, “मैंने अपने माता-पिता को कभी नहीं बताया. और ना ही मैं किसी डॉक्टर के पास गई. शायद हमारे समाज में इस बीमारी को ऐसे ही देखते हैं कि उदासी है तो खुद ही ठीक हो जाएगी. मैं भी यही सोचती रही.”
मनिंदर खुशकिस्मत रहीं कि उन्हें एक संवेदनशील जीवनसाथी मिला. उनके साथ ने मनिंदर को संभाला और मजबूत बनाया. वह कहती हैं, “मेरे पति से मिलने के बाद मेरी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया. मेरे पति ने बहुत छोटी उम्र में अपनी मां को खो दिया था. फिर उनके पापा ने दूसरी शादी कर ली और दूसरी मां ने प्यार नहीं दिया. वह भूखे भी रहे और अकेले भी. जब मैंन उन्हें अपने दुख के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे मां-बाप तो हैं, मुझे तो लगता है कि जिस दिन मेरी मां मरी, उसी दिन मेरे पापा भी मर गए. उनकी बातें सुनकर लगा कि मैं अकेली नहीं हूं. जो लोग हंस रहे हैं, उनकी हंसी के पीछे कितना गम हो सकता है, हमें पता भी नहीं.”
लेकिन डॉक्टर कहते हैं कि बेहतर होगा आप किसी प्रोफेशनल से मिलें. क्योंकि डिप्रेशन एक खतरनाक बीमारी है. यह एक घुन है जो अंदर ही अंदर खाता है. इसका इलाज जरूरी है. मन का इलाज जरूरी है.




