16 साल का जुनैद अपने भाई और दो अन्य दोस्तों के साथ दिल्ली से हरियाणा के बल्लभगढ़ की ओर जा रहा था. ट्रेन से. ईद के लिए खरीदारी करके जुनैद घर लौट रहा था. कुछ लोगों ने इन चार किशोरों पर हमला किया. उन्हें इस कदर पीटा गया कि जुनैद की जान चली गई. हिंदुस्तानी मीडिया की रिपोर्ट्स में उस रेलवे कंपार्टमेंट का हाल बयां किया गया है, जिसमें यह वारदात हुई. एक रिपोर्ट कहती है कि खून इतना था कि लग रहा था, होली खेली गई हो.
उससे दो दिन पहले कश्मीर के नौहाटा में डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को भीड़ ने पत्थरों से पीट-पीटकर मार डाला. उससे कुछ हफ्ते पहले, दिल्ली में एक रिक्शावाले ने दो युवकों को सड़क किनारे पेशाब करने से रोका तो उन्होंने उस रिक्शावाले को इतना मारा कि उसकी जान चली गई. उससे कुछ हफ्ते पहले झारखंड में भीड़ ने पीट-पीट कर 18 लोग मार डाले. क्यों? क्योंकि अफवाह फैल गई थी कि कुछ लोग बच्चे चुरा रहे हैं. किसने बच्चे चुराए, कब चुराए कोई पता नहीं पर भीड़ को जिस पर भी शक हुआ उसे वहीं मार डाला गया... उससे कुछ महीने पहले... इस फेहरिस्त का कोई आखिर नहीं है. इन घटनाओं के ब्यौरे दिल दहला देने वाले हैं. क्या यह चिंता की बात है. जानमाने साहित्यकार पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, “य़ह बेहद चिंताजनक स्थिति है. हमारा समाज कोई बहुत अहिंसाप्रेमी समाज नहीं है. और समाजों की तुलना में हमारा समाज कुछ ज्यादा हिंसक समाजा रहा है. और उसके कारण हैं चूंकि बहुत सारे विभेद हैं, बहुत सारे तनाव हैं. लेकिन जो स्थिति पिछले कुछ बरसों से बनी है, वो अभूतपूर्व है. और ये जो सड़कों पर हिंसा की बात है, यह असल में उस विजिलांते टेंडेंसी का विस्तार है जिसे पिछले कुछ दिनों में प्रोत्साहन दिया है. जिसमें कि आप किसी भी व्यक्ति के घर में घुसकर उसे पीट सकते हैं. आप लोगों के कपड़ों, खानों पर अपनी मर्जी थोप सकते हैं.”
क्या भारतीय समाज अचानक ऐसा हुआ है? क्या देश में, समाज में ऐसा गुस्सा पहली बार है जबकि भीड़ किसी के घर में घुसकर उसे मार डालती है, किसी को राह चलते पीटकर मार डालती है? पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं हां, यह पहली बार है. वह कहते हैं, “इस तरह का माहौल मैंने नहीं देखा. ऐसी बेचैनी मंडल आंदोलन के दिनों में थी जब बहुत सारे लोगों ने आत्मदाह किये थे. लेकिन वो आत्मदाह थे, वे भी चिंताजनक थे, ये लिंचिंग है. इस तरह की लिंचिंग की जो स्थितियां हम देख रहे हैं, कुछ घटनाएं हुई हैं, वे तो अभूतपूर्व हैं.”
ये कौन लोग हैं जिन्हें ना पुलिस का डर है ना कानून का? गांधी-नानक के देश में ये भेड़िये कौन हैं जिन्होंने इंसानी मुखौटे पहन लिए हैं. क्यों इन्हें पहचाना नहीं जा सकता? व्यंग्यकार साहित्यकार विष्णु नागर इसके लिए राजनेताओं को, सरकारों को जिम्मेदार ठहराते हैं. वह कहते हैं, “चलिए मान लिया कि यह वास्तविक भावनाएं हैं लोगों की, तो पुलिस और प्रशासन का इतना कंट्रोल क्यों नहीं है कि अगर कोई गलत काम हो रह है, मान लो गाय की सचमुच ही हत्या हो रही है, तो पुलिस और प्रशासन उसे अपने स्तर पर सख्ती से रोक सके. जाहिर है कि ये गिरोह छोड़े गए हैं ताकि इस समाज में लगातार नफरत फैलाई जा सके.”
अभी कुछ दिन पहले सिडनी फिल्म महोत्सव में एक फिल्म दिखाई गई, सेक्सी दुर्गा. उस फिल्म में एक लड़की रात के वक्त कहीं जाने के लिए घर से निकलती है. लड़की होने के बावजूद घर से अकेले रात के वक्त निकलना उसका गुनाह साबित होता है. उसके साथ क्या क्या हो सकता है, इसका बयां शब्दों में करने की जरूरत नहीं है. निर्भया के साथ चार साल पहले हुई वहशत आज भी दिल थर्रा देती है. फिल्म सेक्सी दुर्गा के लेखक निर्देशक सनल कुमार कहते हैं कि यही होता है जब हिंसा को पूजा जाता है. वह कहते हैं, “हम हिंसा की पूजा करते हैं. समाज के तौर पर हम सोचते हैं कि युद्ध करना एक बहादुरी है. हम पुरुषों को योद्धा की तरह देखते हैं, हम लोगों को सिखाते हैं कि अगर आप युद्ध करते हैं, अगर समाज, संस्कृति के देश के खिलाफ बोलने वाले को मार देते हैं तो आप नायक बन जाते हैं. यह हमारी संस्कृति है. इसे ऐसे ही तैयार किया जाता है. इसलिए लोग सोचते हैं कि हिंसा को इस्तेमाल करना सामान्य बात है.”
लेकिन जनता तो जनार्दन कही जाती है. उसे तो सब समझ आता है. उसके अंदर भावनाएं होती हैं तो बुद्धि भी तो होती है. फिर भारत की जनता को क्या हुआ है. पुरुषोत्तम अग्रवाल का एक उपन्यास है नाकोहस, जिसमें वह आहत भावनाओं की बात करते हैं. अग्रवाल इस जनता को जनता नहीं मानते. वह कहते हैं, “यह सही है कि जनता समझदार होती है लेकिन यह भी सच है कि भीड़ हमेशा पागल होती है. आप इस जनता और भीड़ के बीच फर्क कीजिए. हम सब लोग जो व्यक्तिगत रूप से समझदार बनते हैं, हमारे जैसे ही लोग जाकर भीड़ के रूप में बहुत भयानक हिंसा कर सकते हैं.”
अतहर जिया कह गए हैं...
तमाम गलियों में मातम बपा था जंगल का
यहां ज़रूर कोई सिलसिला था जंगल का
हमारे शहरों में अब रोज़ होता रहता है
वो वाकया जो कभी वाकया था जंगल का



