जयंती गुप्ता एक सपना देखती हैं. सपना कि ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय उपमहाद्वीप के लोगो की एक पहचान हो, उनकी संस्कृति.
कैनबरा में रहने वालीं जयंती गुप्ता इंटिग्रेटेड कल्चर्स नाम की एक संस्था चलाती हैं और मकसद है, भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों को साथ लाना. वह कहती हैं, "भारत में जैसे भाषा के आधारित पर राज्य बन गए. उसकी वजह से हम लोग कभी कभी एक दूसरे अलग हो जाते हैं. जब हमसे कोई पूछ है कि हम लोग कौन हैं, तो हम खुद को भारतीय नहीं कहते. हम कहते हैं कि हम गुजराती हैं, मराठी हैं, पंजाबी हैं. तो यहां आने के बाद मुझे लगा कि हमारा जो उपमहाद्वीप है, उसमें पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, नेपाली, श्रीलंकन भी हैं. हम सब में काफी समानता है. हमारी संस्कृति एक ही है. तो क्यों ना हम लोग मिल जुलकर काम करें."

अपने सामाजिक योगदान के लिए एसीटी वॉलन्टियर ऑफ द ईयर अवॉर्ड पा चुकीं जयंती गुप्ता कहती हैं कि हम एक दूसरे को टॉलरेट ना करें, एक्सेप्ट ना करें बल्कि सही मायने में इंटिग्रेट हो जाएं. वह कहती हैं, "मल्टिकल्चरलिजम तो हमने भारत से ही सीखा है. वहां जितनी विभिन्नता है, वहीं से हमारे अंदर है. और यहां ऑस्ट्रेलिया में हम मल्टिकल्चर कम्यूनिटी होने के नाते सरकार से सुविधाओं की मांग भी करते हैं, तो हमें बदले में देश को कुछ तो देना होगा. इसी मकसद से हमने इंटिग्रेटेड कल्चर्स बनाई है."

नई दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के साथ काम कर चुकीं जयंती गुप्ता कैनबरा में तमिल रेडियो भी चलाती थीं. जयंती गुप्ता की एक और संस्था विमिंज नेटवर्क भी है जो महिलाओं की समस्याओं के लिए काम करती हैं. वह बताती हैं, "जो नए लोग आते हैं, उनमें आदमी तो काम पर लग जाते हैं लेकिन महिलाएं ज्याजा जूझती हैं. उन्हें ज्यादा मदद की जरूरत होती है." इस संस्था ने हाल ही में एक प्रोजेक्ट घरेलू हिंसा पर किया जिसके तहत बच्चों को बचपन से ही जागरूक किया जाता है.
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