73 years ago on this very date 14th August 1947, Pakistan was created and parts of India got divided. The two self-governing countries of Pakistan and India came into existence at midnight of 14th-15th August 1947. This partition was the largest exodus of Modern History as India got divided along the lines of religious majority. More than 14 million people were displaced and more than 1 million died.
सुभाषिनी चानना
भारतीय, ऑस्ट्रेलियन इंडियन हिंदी असोसिएशन
बंटवारे के वक्त हमारे घर के आसपास बहुत से मुस्लिम परिवार रहते थे. हम बच्चे साथ खेलते थे. अचानक एक दिन हमारा घर के बाहर जाना ही बंद हो गया. हम तो बच्चे थे, हमें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है. और नीचे हमने खिड़की के बाहर झांककर देखा तो वहां ट्रक खड़े थे, लाशों से भरे हुए. हमने देखा कि वे लोगों की लाशें फेंक रहे हैं ट्रकों में. रात के वक्त में छतों पर जाते थे. हम कनॉट प्लेस में रहते थे तो वहां से हमें पहाड़गंज के जलते घर दिखते थे. सबसे बुरा मुझे लगा कि हमारे दोस्त बिछड़ गए. काफी साल बाद मेरे बड़े भाई के एक दोस्त पाकिस्तान से मिलने आए.

जावेद नजर
पाकिस्तानी
मेरे माता-पिता का ताल्लुक यूपी से रहा. मेरे वालिद भारत-पाक के बड़े शायर रहे. वह रेलवे में काम करते थे. वह प्लेन से लाहौर आ गए. मेरी मां और दो भाई दिल्ली से ट्रेन से आए थे. वह बताती थीं कि पश्चिमी पंजाब यानी जो हिंदुस्तानी पंजाब से गुजरे थे. और मेरे वालिद साहब उस वक्त लाहौर में थे. उन्हें तब बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि मेरी मां बची होगी. जब वह स्टेशन पर पहुंचे तो अजीब समां था. भूखे. किसी के जिस्म पर कपड़े नहीं. जूते नहीं. और स्थानीय लोग उन्हें परांठों पर गुड़ रखकर खिला रहे थे. तब मेरे वालिद साहब की नजर पड़ी मेरी अम्मी पर. इस मौके पर मुझे गुलजार की ये नज्म बहुत याद आती है...
लकीरें हैं
तो रहने दो
किसी ने गुस्से में वो खींच दी थीं.
उन्हीं को अब बनाएं पाला
और आओ कबड्डी खेलते हैं
मेरे पाले में तुम आओ
मुझे ललकारो, भागो
तुम्हें पकड़ूं, लपेटूं, टांग खेंचूं
और तुम्हें वापस ना जाने दूं
और तुम्हारे पाले में जब कौडी कौडी करता जाऊं मैं,
मुझे तुम भी पकड़ लोगे,
मुझे छूने नहीं दोगे
वो सरहद की लकीरें जो गुस्से में खेंच दी थीं किसी ने
उन्हीं को अब पाला बनाएं
और आओ कबड्डी खेलते हैं
लकीरें हैं
तो रहने दो

जुबिन मरौलिया
कराची के पारसी
हम पारसियों पर तो ज्यादती नहीं हुई लेकिन आसपास सुना कि कितना जुल्म हुआ. मेरी मां बताती थीं कि हमारे घर के पीछे लोगों को कैसे मारा गया. लोगों का एक पांव खंभे से बांध देते थे और दूसरा पांव जीप से बांधकर खींचते थे. उसे दो टुकड़ों में बांट देते थे. 50 साल बाद भी ये कहानियां सुनते हुए हमारी मां कांपने लगती थीं.

बलवंत चड्ढा
भारतीय
बंटवारे के वक्त मेरे पिता तो केन्या में थे. हम वहां से निकले तो आर्मी ने ट्रेन में बिठा दिया. वो आखिरी ट्रेन थी लाहौर से जो जा रही थी. दो दिन तक वहीं फिरते रहे. दूध नहीं था और इस कारण मेरी बहन चल बसी. फिर ट्रेन चली और भारत पहुंची. हमें उस ट्रेन से सोनीपत या पानीपत में उतार दिया गया. वहां मेरी मां ने अपने कुछ गहने बेचे और एक घर किराये पर लिया. वो घर किसी ऐसे का था जो पाकिस्तान चला गया था. वहां हम रहे. लेकिन हमारे पिता से कोई संपर्क ही नहीं हुआ. मेरे पिता चार महीने तक हमें खोजते रहे. वो हर उस जगह गए जहां लाहौर से आने वाली आखरी ट्रेन रुकी थी. तो जब वो पानीपत पहुंचे, वहां एक खेलते बच्चे से पूछा कि बिल्लू को जानते हो. उस बच्चे ने कहा कि हां बिल्लू तो हमारे साथ खेलता है. इस तरह हम हमारे पिता से मिल पाए.

