When not-so-bollywood met hollywood at Winton

Winton Film Festival

Winton Film Festival Source: www.visionsplendidfilmfest.com

The most remote and the best attended film festival, per capita, in the world! Thats the claim of the organisers from Winton, a town with a population of over 1000 people. This year the festival was attended by 2,850 people, including four Indian film students. How was their experience? Take a listen...


एफटीआईआई में एडिटिंग के छात्र आकाश गवली बताते हैं कि बहुत मजा आया. गवली कहते हैं, "बहुत सीखने को मिला यहां पर. मैंने एबॉरिजनल कलाकारों के साथ काम किया. तो उनकी संस्कृति के बारे में भी बहुत कुछ सीखने को मिला."

दरअसल विजन स्पलेंडिड फिल्म फेस्टिवल की दिलचस्प बात यह है कि यहां विभिन्न देशों के फिल्म स्टूडेंट्स बुलाए जाते हैं. वे लोग 15 दिन साथ रहते हैं, साथ काम करते हैं और फिल्में बनाते हैं. इस तरह वे एक दूसरे से ऐसी ऐसी बातें भी सीख पाते हैं, जो अपने देश में रहते हुए सोच भी नहीं सकते. जैसे कि एफटीआईआई में निर्देशन पढ़ रहे मुकुल हलोई कहते हैं कि हमारी संवेदनशीलता और समझ बाकी देशों के स्टूडेंट्स से अलग थी. वह कहते हैं, "जैसे हम एफटीआईआई में ग्रैजुएशन करने के बाद आते हैं. तो हमारी संवेदनशीलता अलग होती है. हम विकासशील देशों के मुद्दे अलग होते हैं. जिंदगी को लेकर हमारी समझ और अनुभव अलग हैं. हम एक मुद्दे को कैसे देखते हैं उसमें फर्क है. तो वे लोग किसी कहानी को कैसे आगे बढ़ाते हैं, यह हम लोगों से अलग होता है."

ब्रिसबेन से करीब 1355 किलोमीटर दूर स्थित विंटन की आबादी एक हजार से भी कम है. और इस बार फिल्म फेस्टिवल में 2850 लोग शामिल हुए. फिल्म फेस्टिवल के निदेशक मार्क मेलरोज कहते हैं कि इतने लोगों का फेस्टिवल में आना एक रिकॉर्ड है, 2014 में जब फेस्टिवल शुरू हुआ था तब इससे आधे लोग आए थे.

और आने वालों में वे स्टूडेंट्स भी थे जिन्हें बहुत अलग अनुभव मिले. आकाश गवली बताते हैं, "हमने एक फिल्म शूट की. उसमें अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं. जैसे मैं एडिटर हूं लेकिन मैंने एक फिल्म के लिए सिनेमेटोग्राफी की. ऐसे अलग अलग काम करने का मौका मिला, इनकी फिल्मों में काम करने का मौका मिला."

और जब अलग अलग बैकग्राउंड्स के कलाकार मिलेंगे तो झगड़े ना हों, ऐसा कैसे हो सकता है. कलाकारों की असहमतियां तो मजेदार होती हैं. यहां भी असहमतियां हुईं. मुकुल हलोई कहते हैं कि जब वे लोग साथ फिल्म बना रहे थे तो उन्हें आइडिया ही पसंद नहीं आया था. और फिर क्या हुआ? हलोई कहते हैं, "ये लोग टीनेजर्स हैं तो ये लोग बहुत हॉलीवुड के तरीकों से करना चाहते थे. तो मुझे पसंद नहीं आया. तो प्रोडक्शन मीटिंग में टीचर ने मुझसे कहा कि तुम मेंटॉर करो. फिर हमने मिलकर काम किया और अच्छी चीज बनी."

ग्रिफिथ फिल्म स्कूल के साथ हुए इस फेस्टिवल में कुल 57 स्टूडेंट्स आए थे. इनमें ग्रिफिथ फिल्म स्कूल और एफटीआईआई पुणे के अलावा बीजिंग फिल्म अकैडमी, द क्वीन्सलैंड कंजर्वेटोरियम, क्वीन्सलैंड कॉलेज ऑफ आर्ट और यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के स्टूडेंट्स थे. इन्होंने मिलकर कई शॉर्ट फिल्में बनाईं जिनमें स्थानीय लोगों ने ही काम किया. अब भारतीय स्टूडेंट्स घर लौटने की तैयारी में लगे हैं. थोड़े दिन ऑस्ट्रेलिया घूमने के बाद वे लोग निकल जाएंगे भारत की ओर, ढेर सारे अनुभवों के साथ.

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