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World Radio Day: Community radio remains 'powerful', amplifying local voices and stories

World radio day

Community broadcaster Sagar Mehrotra (R) joined SBS Hindi's Vrishali Jain (L) in the studio on a conversation on power and relevance of radio in the contemporary times. Credit: SBS/Vrishali Jain

13 February is celebrated as the World Radio Day. On this occasion, we sat down with Sagar Mehrotra, a Sydney-based community radio broadcaster, to discuss how the medium has evolved over the past five years. From shifting listener habits to changing community expectations, the conversation explores the power of language, culture and connection in multicultural Australia. The discussion also highlights both opportunities and operational realities shaping community radio’s enduring relevance for migrant audiences and local storytelling today.


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This podcast has been transcribed with the help of AI. Know more here.

[थीम म्यूजिक] दोस्तों, 13 फरवरी को हर साल वर्ल्ड रेडियो डे मनाया जाता

है। इसे यूनेस्को के सदस्य देशों द्वारा 2011 में घोषित और 2012 में

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वीकृति मिली थी। यह दिन प्रसारकों को समर्पित है।

उन खबरों को, उन कहानियों को जो हम आप तक रोज़ाना के तौर पर लेकर के आते हैं। आज

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भले ही एक नया अध्याय लिख रही है, लेकिन तकनीक भरोसा नहीं

पैदा कर सकती। भरोसा प्रसारक और व्यक्तिगत रिश्ते बनाते हैं और यह ज़्यादाकर सत्य होता

है सामुदायिक रेडियो में। इसीलिए आज हमारे साथ जुड़े हैं सागर मेहरोत्रा, जो सिडनी में

करीबन दो दशक से भी लंबे समय से, मुझे ऐसा कहना चाहिए, इंडियन लिंक रेडियो के साथ

जुड़े हुए हैं। इंडियन लिंक दो दशक से भी लंबे समय से समुदाय के लिए रेडियो के स्पेस

में काम कर रहा है। तो, सागर सबसे पहले तो इस मौके पर आपका स्वागत है एसबीएस में।

-थैंक यू वृषाली, थैंक यू सो मच। -तो सागर कैसे यह शुरू हुई, सामुदायिक रेडियो

-की पूरी जो एक यात्रा है? -यह बहुत इंटरेस्टिंग इंसिडेंट है वृषाली।

मैं ऑस्ट्रेलिया 2003 में आया था एंड इंडियन लिंक की मैगज़ीन उस समय एक इकलौती

मैगज़ीन हुआ करती थी, जो इंडियन शॉप्स पर हमें मिला करती थी और मैं अपने दोस्तों के

साथ फ्लैट में रहा करता था। पांच लोग हम लोग रहते थे। उसमें से एक मेरे दोस्त ने वह

मैगज़ीन दे, वो लेकर आया था और उसमें इंडियन लिंक के, के लिए एंकर्स की ज़रूरत थी। और

उसने अप्लाई किया और

मुझे भी एक्साइटमेंट हुआ। मैं, मुझे भी, मैं भी इंट्रीग हुआ थोड़ा सा कि मैं भी अप्लाई

करना चाहता हूं। यह चीज़ कभी मैंने ट्राई नहीं करी थी। मेरा कोई बैकग्राउंड नहीं है

रेडियो का। मैंने कुछ सीखा नहीं है, कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली है। तो मैंने भी

अप्लाई किया। मैंने उसके लिए ऑडिशन दिया और ऑडिशन में सक्सेसफुल भी हो गया एंड रेस्ट इज

हिस्ट्री। 2004 के आसपास मैंने रेडियो इंडियन लिंक रेडियो ज्वाइन किया था

और देखते-देखते वक्त कहां निकल गया। ऐसा लगता है कल की बात है क्योंकि मैं जब भी अभी

भी ऑन एयर जब जाता हूं तो उतना ही एक्साइटमेंट होता है। मुझे अपने श्रोताओं से

बात करने का उतना ही एक्साइटमेंट होता है। मुझे नए-नए टॉपिक डिस्कस करने का, उतना ही

एक्साइटमेंट होता है उन नए गानों को प्ले करने का। तो सारी चीजें मिला जुला के मेरे

लिए अभी भी एक जैसे एक छोटा बच्चा होता है, उसको एक नया खिलौना अगर आप दे दो तो वो उसके

साथ खेलता है ना। वो खेलना चाहता है, उसके साथ उसको वो टटोलना चाहता है, उसको वो, उसको

एक्सप्लोर करना चाहता है। तो मैं आज भी रेडियो के लिए उतना ही एक्साइटेड हूं, उतना

ही मेरे अंदर आकर्षण है रेडियो का। -जी तो अभी भी जब आप ऑन एयर जाते हैं सागर,

-सबसे सुंदर बात क्या है आपके लिए? -मेरे श्रोता! अगर एक वर्ड में जवाब देना हो

तो मेरे श्रोता। हम ना सिर्फ इंफॉर्मेशन देते हैं, बल्कि इंफॉर्मेशन के साथ-साथ

एंटरटेनमेंट भी देते हैं। तो एक रिश्ता सा बन गया है श्रोताओं के साथ। और सबसे बढ़िया

बात है, आपने बहुत अच्छा सवाल पूछा है, पहली बात तो वृषाली ये, एक, एक रिश्ता होता है

जो आप अपने श्रोताओं के साथ बनाते हैं। देखिए, बहुत एक नायाब चीज़ है। आप किसी को

जानते नहीं हैं, आपने उनको देखा नहीं है। वो आपको सुन रहे हैं, आप उनको सुन रहे हैं। एक

रिश्ता सा कायम हो जाता है और वो रिश्ता अगर साल दर साल चलता रहे तो एक अपने आप में

-बहुत बड़ी ब्लेसिंग है। -बात अगर पिछले पांच साल की करें सागर, खासकर

-जो कोविड का पीरियड हम सब ने देखा- -जी।

...उसमें ब्रॉडकास्टिंग, पॉडकास्टिंग का एक जो पूरा स्पेस है, पूरी तरह से पलटा। आपके

अनुभव में कम्युनिटी रेडियो किस तरह से बदला?

कम्युनिटी रेडियो ने अपने बहुत एक

बदलाव इस पांच सालों में देखा है। देखिए, पहले यह सिर्फ एक

एंटरटेनमेंट का माध्यम हुआ करता था। मुख्य आकर्षण हुआ करता था, अगर मैं ऐसा कहूं उसको।

लेकिन कोविड के बाद यह चीजें बहुत बदली हैं। कोविड के बाद पूरा एक परिवेश बदला है,

समाज का, कम्युनिटी का। हमने कोविड के दौरान एक कोविड जैब करके एक सॉन्ग, एक जिंगल

बनाया था, जिसमें हम लोगों को बता रहे थे कि कोविड वैक्सीन ज़रूरी क्यों है? क्योंकि अगर

आप याद करें, उस समय कोविड वैक्सीन को ज्यादा लोग लेना नहीं चाहते थे। कोविड जैब

इतना फेमस हुआ कि मल्टीकल्चरल अवार्ड्स के लिए भी उसको नॉमिनेट किया गया था। जैसे कि

मैंने कहा, समाज के परिवेश थोड़ा सा बदलाव आया। उसमें लोग ज्यादा इंफॉर्मेशन हंग्री हो

गए। सोशल मीडिया बहुत

हद तक उसमें उभर के आया था सामने। तो लोगों को इंफॉर्मेशन चाहिए थी और इंफॉर्मेशन चाहिए

-थी जहां पर वो अपने भी योगदान को दे सकें। -जी तो यह बात हुई कि किस तरीके से रेडियो

पांच साल में बदला? लेकिन भाषा आधारित रेडियो जिसको हम कहते हैं लैंग्वेज बेस्ड

-रेडियो- -जी।

-कितना जरूरी है आज की ऑस्ट्रेलिया में। -बहुत जरूरी है। देखिए, हम मल्टीकल्चरल

सोसाइटी में रहते हैं वृषाली जी, और यहां पर भिन्न-भिन्न कम्युनिटी से लोग यहां पर आकर

बसते हैं, ऑस्ट्रेलिया में बसते हैं और ना सिर्फ उसमें हिंदी भी होते हैं, गुजराती भी

होते हैं, मराठी भी होते हैं। अनेक समुदाय के लोग होते हैं इंडिया से ही। पहली बात तो

यह आपके लिए ब्लेसिंग है और मैं मानता हूं इंडियन लिंक रेडियो के थ्रू मुझे यह

ब्लेसिंग मिली है कि तमाम उन समुदाय के लोग एक जुट होकर एक साथ एक ही, एक ही माध्यम पर

आकर भले ही गाने हिंदी के प्ले हो रहे हों लेकिन फिर भी आकर बात करते हैं। वो इसलिए

करते हैं क्योंकि उनको सब जोड़ने का जरिया एक ही है और वो है हमारा, हमारे ट्रेडीशन,

हमारा कल्चर और प्लस ओब्वियसली जो दुनिया भर में हो रहा है, वो सबको इंपैक्ट कर रहा है।

लेकिन साथ ही साथ आपका कहना यह भी सही है कि हम कई सारे लैंग्वेज को भी हम प्रमोट

करते हैं और कई बार ऐसा होता है कि हम अलग-अलग तरीके के गाने प्ले करते हैं,

अलग-अलग कम्युनिटीज़ की तरफ से बातें करते हैं। हमारा जो प्रोग्रामिंग चलती है, उसमें

हम अलग-अलग लोगों को कैटर करते हैं। कुछ लोग होते हैं जो सिर्फ आध्यात्म की तरफ ज़्यादा

फोकस होते हैं, तो उनके लिए भजन का प्रोग्राम होता है। कुछ लोग होते हैं जो

थोड़े से रीजनल सॉन्ग्स भी प्ले करना चाहते, सुनना चाहते हैं और कभी-कभार ऐसा भी होता

है कि हम अलग-अलग लैंग्वेज के शोज़ भी लेकर आते हैं। तो यह बहुत ज़रूरी है। हम मल्टी

कल्चरल सोसाइटी में, कम्युनिटी में रह रहे हैं तो इसकी अहमियत बहुत है।

पावर ऑफ रेडियो पर क्या कहेंगे सागर? क्योंकि बहुत सारे ऐसे आर्गुमेंट्स आते हैं,

हम आज चर्चा करें तो कि रेडियो अपनी ताकत खो रहा है। क्या सचमुच रेडियो अपनी ताकत खो

-रहा है? -इस बात से मैं थोड़ा सा असहमत होगा क्योंकि

आप देखें टीवी

बहुत अरसे पहले आया था और टीवी ने अपनी एक खास जगह बनाई है। और टीवी पर आप कार्यक्रम

देखें, कितने वैरायटी ऑफ शोज़ आते हैं वहां पर। लेकिन रेडियो उसके बावजूद सबसे पहली चीज

अगर गाड़ी में बैठते ही कोई ऑन करता है तो वो टीवी नहीं होता है, वो रेडियो होता है।

और रेडियो भी ऐसा अगर उसको श्रोता को कुछ एंटरटेनमेंट मिल रहा है, कुछ खबरें मिल रही

हैं, एक अपनी बात रखने का... मौका मिल रहा है और यहां पे हमें अगर किसी श्रोता को

मिल रहा है तो मैं तो बहुत खुशकिस्मती समझता हूं। मैं समझता हूं रेडियो की बहुत पावर है

-उसमें। -और किस तरीके से आप सामुदायिक रेडियो का

भविष्य देखते हैं? आज हम, आप करीबन बाइस साल से ये कर रहे हैं-

-जी। -और आगे बढ़ते हुए किस तरीके से बदलते हुए

देख रहे हैं चीजों को, क्योंकि तकनीक बड़े तरीके से बदल रही है।

जी हां, जी हां, बिल्कुल। देखिए, इसमें आपने एक सवाल बहुत अच्छा किया है ये, कि रेडियो

हमेशा अपनी एक जगह बनाए रखेगा और वो इसलिए बनाए रखेगा क्योंकि रेडियो में भी बदलाव हो

रहे हैं। खाली अब ये एक वो माध्यम नहीं रह गया है जहां पे एक प्रसारक बैठ के बातें कर

रहा है, बल्कि एक ऐसा माध्यम है जैसे हम और आप बैठ के बातें कर रहे हैं, जिसको पॉडकास्ट

के एंगल के रूप में हम देखते हैं और इससे कई मुद्दों पर बातें हो सकती हैं। लोगों को

सिर्फ इन्फॉर्मेशन नहीं मिलती है, बल्कि वो कुछ चीजें सीखते भी हैं। अगर आजकल के टाइम

में देखें तो एक बहुत बड़ा चेंज है, इवोल्यूशन है हमारे रेडियो में। तो थिंग्स

-लाइक पॉडकास्ट चेंजिंग रेडियो अ लॉट। -हमने एक्साइटमेंट पर तो बहुत सारी बात की

-है- -जी, जी।

लेकिन एक चीज ऐसी क्या है जो आपको लगती है अगर ये ना हो तो थोड़ी बेहतर रहती चीजें?

देखिए, बहुत सारी चीजें हो सकती हैं, लेकिन यहीं पे आता है कि एक प्रसारक की

रिस्पांसिबिलिटी बन जाती है कि वो किस तरीके से चीजों को

एक प्रचारक के रूप में ना बात करे, बल्कि एक एस, एज़ अ फैसिलिटेटर के रूप में बात करे।

एक, एक बायस्ड ओपिनियन नहीं होना चाहिए उसमें। तो वो एक चैलेंज है। मैं समझता हूं

कि आप किस तरीके से न्यूट्रल रह, रह के भी लोगों के थॉट्स को, लोगों के ओपिनियंस को आप

-ले सकते हैं। -सागर बात हम चैलेंज की कर रहे हैं,

चुनौतियों की कर रहे हैं तो क्या ऐसी चुनौतियां हैं जो रोजाना के तौर पर एक

कम्युनिटी ब्रॉडकास्टर के रूप में आपके सामने आती हैं?

मैं समझता हूं वृषाली जी, कि सबसे बड़ी चुनौती है लोगों तक रेडियो की पहुंच। वो

पहुंचना बहुत जरूरी है। लोगों का समझना बहुत जरूरी है कि कम्युनिटी रेडियो स्टेशनस

एक्जिस्ट करते हैं और उनको लोग किस तरीके से सुन सकते हैं, क्या क्या माध्यम है सुनने

के लिए और वो इंफॉर्मेशन अवेलेबल है उनके पास। आपके पास अगर आपको ये पता हो कि आपको

प्यास लगी और आपको ये पता हो कि पानी है, लेकिन ये ना पता हो कि कहां है तो शायद

-लोगों के लिए वो चुनौती हो जाएगी। -तो किस तरीके से उनका एडवर्टाइजमेंट होता है

या किस तरीके से वो उपलब्ध होते हैं, ये एक चैलेंज है। ये तो बात हुई हमारे आज के

-स्पेस की। -जी।

लेकिन अगर मैं आपसे पूछूं कि अगर आप ब्रॉडकास्टर नहीं होते सागर तो क्या होते

-हैं? -मैं अभी भी जॉब तो मैं अभी भी कर ही रहा

हूं। [हंसी] लेकिन अगर मैं ब्रॉडकास्टर नहीं होता तो शायद मैं लोगों से जुड़ने का,

देखिए, मुझे बात करने का शौक है और मैं लोगों के साथ

हंसी मजाक करना चाहता हूं तो शायद मैं खुद का अपना एक

पॉडकास्ट चैनल होता मेरा, लोगों से बात कर रहा होता।

और

सिडनी के मल्टीकल्चरल स्पेस के लिए क्या कहेंगे? किस तरीके का स्पेस रहा है और किस

-तरीके से इवॉल्व किया है इतने समय में? -सिडनी के स्पेस ने तो बहुत बड़ा इवोल्यूशन

देखा है। मैं जब, मुझे याद है कि जब मैं यहां दो हज़ार चार में मैंने रेडियो शुरू

किया था, उस टाइम पे जो कम्युनिटी थी, वो बहुत लिमिटेड थी। एक तो कम थे ओब्वियसली

माइग्रेशन, माइग्रेशन जब उतना नहीं था

और

मैं अपने रेडियो का एग्जांपल लूंगा क्योंकि हमारा रेडियो, रेडियो सेट के जरिए चला करता

था और बहुत कम लोगों तक पहुंच पाता था। क्योंकि जिनके पास रेडियो सेट होता था, वही

सुन पाते थे। लेकिन अब चूंकि वो एक डिजिटल वर्ल्ड में जा चुका है ऐप के जरिए, तो अब

लोगों की पहुंच उसमें बढ़ गई है और एक वास लैंडस्केप मैंने देखा है। पूरी कम्युनिटी

में, ना सिर्फ सिडनी में, बल्कि पूरे ऑस्ट्रेलिया में बोलूंगा और ऑस्ट्रेलिया के

बाहर भी बोलूंगा मैं। एक वास लैंडस्केप देखा है और जहां पे हर एज ग्रुप के लोग उससे

जुड़ना चाहते हैं। सबके पास कहने के लिए कुछ है।

और इसी कहने पर एक सवाल पूछता हूं सागर मैं आपसे-

-जी, जी। -कि आपके यंगेस्ट लिसनर ने आपसे कौन सी सबसे

अतरंगी डिमांड की है और आपके ओल्डेस्ट लिसनर ने आपसे सबसे कौन सी अतरंगी डिमांड की है?

अरे! [हंसी] मुझसे जो कहा जाता है, जो सबसे अतरंगी मुझे लगती है, वो होती है कि गाना आप

भी गाइए ना कभी। मैंने कहा, मैं गाना गाऊंगा तो सारतों, सातों सुरो पे लाठी चार्ज

करूंगा। आप वो चाहते हैं तो मैं कर लेता हूं, कर लेता हूं।

-जी। -और आप चाहते हैं रेडियो बंद हो जाए तो मैं

कर लेता हूं। [हंसी] ये तो सबसे बड़ी अतरंगी डिमांड रही है मुझसे। लेकिन जो मेरे बहुत

क्यूट एक

मेरा लिसनर

रहा था, वो सात या आठ साल का था। उसने आकर कविताएं सुनाई थी, मुझे बहुत अच्छी लगी। ये

मेरे लिए सबसे अच्छी एक

-गिफ्ट था। -कम्युनिटी रेडियो स्पेस में अगर आपसे पूछा

जाए कि भाई ये सबसे अतरंगी है, जो फॉर्मल या कमर्शियल रेडियो में आपको ये चैलेंज नहीं

आएगा और आपको लगता है आप कुछ कह भी नहीं सकते और करना भी पड़ेगा।

बहुत सी बार होता है ऐसा वृषाली जी, कि लोग अपने फीडबैक देते हैं। लोगों का हक है, उनका

फीडबैक देना। मुझसे किसी ने यह कहा था कि मैं एक तरीके के गाने प्ले कर रहा हूं और कई

बार होता है, बहुत अमूमन चीज है। एक और आप किसी तरीके के गाने प्ले कर रहे हैं और आपको

एकदम से कोई आकर बोलता है कि एक काम करो क्या आप? ये गाने ना प्ले करो आप, आप ये

हमारा वाला गाना प्ले करो और जो कहीं से उसमें फिट नहीं बैठता है तो अब मैं मना नहीं

कर सकता हूं। [हंसी] तो किस तरीके से आप उससे डील करते हैं? अब ये बहुत एक

इंपॉर्टेंट चीज है, क्योंकि आप लोगों को ऑफेंड भी नहीं कर सकते हैं और साथ ही साथ

आपको उनकी डिमांड्स भी पूरी करनी है।

अगर आपको अपने लिसनर वर्ल्ड को पांच शब्दों में समराइज करना हो तो वो पांच शब्द क्या

होंगे? अगर आपको कहना हो कि पांच शब्दों में ये है मेरा श्रोता जगत।

मेरा श्रोता जगत बहुत सुलझा हुआ है। सुझाव मैं अगर पांच शब्दों में बोलना हो तो पांच

शब्द, शब्द से ज्यादा हो गए। [हंसी] मैं तीन शब्दों में मैं बोल सकता हूं उसको कि बहुत

-सुलझा हुआ है। -जी, क्या कहना चाहेंगे वर्ल्ड रेडियो डे पर

-आज जो लोग आपको सुन रहे हैं, उनको। -हम आज एक ऐसे दुनिया में रह रहे हैं, एक ऐसे

संसार में रह रहे हैं, जहां पे हर एक को बोलने का हक है और बोलना बहुत जरूरी है।

लेकिन इस बात का हमें बहुत ध्यान रखना चाहिए कि हम क्या बोल रहे हैं और किस तरीके से

बोल रहे हैं। कहते हैं ना कि ऐसी वाणी बोलिए।

-मन का... -मन का आपा होए।

औरन को शीतल करे, आपहूं शीतल हुए। तो इसी पर वाणी की इसी चर्चा पर आज

की इस चर्चा को विराम दे रही हूं। सागर आप आए, उसके लिए बहुत शुक्रिया।

-थैंक यू। -लेकिन आप सुनते रहिए एसबीएस हिंदी को वर्ल्ड

रेडियो डे पर हमारी तरफ से, मेरी और सागर की तरफ से आपको ढेर सारी बधाईयां!

-आपको भी। -आपका ही ये प्यार है जो हम वर्ल्ड रेडियो डे

मना भी पाते हैं तो थैंक यू, थैंक यू सो मच। बहुत बहुत धन्यवाद। फिर मिलेंगे। सुनते

-रहिए एसबीएस हिंदी को। -[म्यूसिक]

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