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क्यों लोग लिख रहे हैं अनजान लोगों को चिट्ठियां

Paromita
दुनियाभर में फैल रही है पारोमिता बार्डोलाई की मुहीम Source: Supplied

क्या आपने कभी चिट्ठियां लिखी हैं? कागज पर, पेन या पेंसिल से टिका-टिका कर, एक एक शब्द सोच-सोच कर चिट्ठियां लिखने का मजा फिर से लिया जा सकता है. कैसे?


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Source: SBS



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क्या आपने कभी चिट्ठियां लिखी हैं? कागज पर, पेन या पेंसिल से टिका-टिका कर, एक एक शब्द सोच-सोच कर चिट्ठियां लिखने का मजा फिर से लिया जा सकता है. कैसे?


वो भी समय था जब चिठ्ठी का इंतज़ार सबसे ज्यादा रहता था. फिल्मों में चिट्ठी-पत्रों पर गाने लिखे जाते थे. कभी सीमा पर तैनात जवान अपने घर पत्र भेजता है, कभी कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को. 

उस पत्र का लोग बेसब्री से इंतज़ार करते थे. डाकिया अपना सा लगता था. कभी चिठ्ठी में ख़ुशी के पैगाम आते थे तो कभी कोई अनचाही खबर भी. पत्र पढ़ने पर लिखने वाले का चेहरा तक लोग उसमें ढूंढ लेते थे, खूबसूरत लिखावट में लिखे खत, किसी में फूल बना हुआ, अब सब यादें ही बन कर रहे गये हैं.

A woman posts a letter in one of the Australian post boxes in the city of Sydney.  (AAP Image/Dean Lewins). NO ARCHIVING.
Sydney. October 25, 2001. A woman posts a letter in one of the Australian post boxes in the city of Sydney. Source: AAP

वक़्त बदला, ईमेल, स्मार्टफोन और संपर्क करने के अत्याधुनिक तरीके ने सब कुछ बदल दिया. अब शायद ही कभी डाकिया आता है. सड़क के किनारे लगे हुए लेटर-बॉक्स भी धीरे-धीरे गायब होने लगे हैं. शायद ही अब कोई किसी को पत्र लिखता है. शायद ही अब किसी को पत्रों का इंतज़ार रहता है.

ये पत्र सिर्फ हाल-चाल ही नहीं पहुंचाते थे. अक्सर इनके ज़रिये एक दूसरे की भावनाओं का आदान प्रदान भी होता था. अब ये सिलसिला टूट सा चुका है. ऐसे में मूलतः असम की रहने वाली और अभी दिल्ली में रह रही एक युवती पारोमिता बोर्डोलोई ने अनूठी मुहीम शुरू की है. वह है एक दूसरे को हाथ से पत्र लिखने की. अब परेशानी ये है कि लोग किसको पत्र लिखें, ऐसे में पारोमिता ने इसका हल निकाला है. उन्होंने एक ऐसा प्लैटफॉर्म दे दिया है जिसमें अजनबी लोग एक-दूसरे को पत्र लिखते है.

आशा-निराशा के बीच ये पत्र एक उम्मीद की किरण की तरह होते हैं. लोग अपने अनुभव साझा करते हैं, भरोसा जताते है, निराशा से उबारते हैं. कई बार पत्र एक दूसरे को बचा भी सकते हैं. लेकिन आजकल के हालात देखते हुए एक दम से किसी को किसी का पता नहीं दे सकते इसीलिए, पहले ईमेल से एक दूसरे को पत्र लिखते हैं फिर धीरे धीरे एक दूसरे का पता साझा कर दिया जाता है.

ये सब कैसे संभव है, पारोमिता को इसके बारे में कैसे विचार आया, इसके बारे में उन्होंने बताया कि शुरुआत तो उन्होंने स्वयं की थी लेकिन धीरे-धीरे ग्रुप बनता गया.

अब तक पारोमिता सैकड़ों पत्र लिखवा चुकी हैं. लोग एक दूसरे को पत्र लिख रहे हैं. देश-विदेश तक पत्र भेजे जा रहे हैं. बहुतों को इसकी वजह से तनाव और खालीपन से उबरने में सहायता मिली है.

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