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इस विभाजित और डिजिटल दुनिया में क्या दुख हमारे बीच की दूरियाँ मिटा सकता है?

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Experts point out the importance of 'grief literacy,' and normalising discussions about grief in Australia. Credit: Dennis Fang/SBS

सोशल मीडिया के दौर में अपना दुख बाँटने का तरीका बदल रहा है, खासकर बॉन्डी टेरर अटैक जैसी घटना के बाद। लेकिन क्या अपना दुख बाँटने से समाज में दूरियाँ कम हो सकती है?


Published

By Lera Shvets, Dennis Fang

Presented by Anita Barar

Source: SBS




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सोशल मीडिया के दौर में अपना दुख बाँटने का तरीका बदल रहा है, खासकर बॉन्डी टेरर अटैक जैसी घटना के बाद। लेकिन क्या अपना दुख बाँटने से समाज में दूरियाँ कम हो सकती है?


दुख जटिल होता है: यह अलग-अलग लोगों और अलग-अलग संस्कृति में अलग-अलग तरह से होता है।

कुछ विशेणज्ञों का कहना है कि डिजिटल और सोशल मीडिया ने चीज़ों को और भी मुश्किल बना दिया हैं।

RMIT यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ मीडिया एंड कम्युनिकेशन की प्रोफ़ेसर लारिसा ह्जॉर्थ ने कहा कि सोशल मीडिया अक्सर साउंड बाइट्स को जगह देता है — जिससे सोच-समझकर बातचीत करने की जगह नहीं बचती।

उन्होंने कहा, "एक बार जब हम किसी भयानक घटना पर जानकारी देख रहे होते हैं, तो एल्गोरिदम हमें दूसरी चीज़ें भेजता है और वह पूरी तरह से बेमतलब हो जाती है। उसमें बारीकियों की कमी होती है।"

उन्होंने SBS एग्ज़ामिन्स को बताया कि कोई भी दुख असल में एक जोड़ने वाली ताकत हो सकता है।

दुख और उम्मीद असल में बहुत गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
Professor Larissa Hjorth, RMIT

क्रिस्टोफर हॉल, ग्रीफ ऑस्ट्रेलिया के CEO हैं, जो सरकार द्वारा फंडेड नेशनल ग्रीफ और शोक सेवा है।

उन्होंने कहा कि शोक मनाने का कोई कल्चरल गोल्ड स्टैंडर्ड नहीं है, लेकिन उन्होंने सुझाव दिया कि मेनस्ट्रीम ऑस्ट्रेलियाई कल्चर मल्टीकल्चरल कम्युनिटी से सीख सकता है।

उन्होंने कहा, "कई वेस्टर्न सोसाइटी किसी भी नुकसान को कम आंकती हैं।"

पश्चिमी समाज खुशी, प्रोडक्टिविटी... किसी भी बात को जाने देने और आगे बढ़ने के विचार को खास महत्व देते हैं।
Christopher Hall, Grief Australia

SBS Examines ने बॉन्डी बीच पर राहगीरों से उनके दुख की, दुख के कल्चरल पहलुओं और क्या सोशल मीडिया उनके लिए दुख झेलने को मुश्किल बना रहा है, इस सब के बारे में बात की।

SBS Examines के इस एपिसोड में, हमने ऑस्ट्रेलियाई लोगों से पूछा कि वे कैसे दुख को कैसे झेलते हैं, और हमें बांटने वाली घटनाओं का दुख लोगों को एक साथ लाने में कैसे मदद कर सकता है।

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