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अमिताभ की फिल्म गुलाबो-सिताबो और लखनऊ

Gulabo Sitabo

आजकल चर्चा में हैं अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की हाल में रिलीज़ हुई फिल्म गुलाबो-सिताबो. इस फिल्म का लखनऊ से गहरा जुड़ाव है.


Published

By Faisal Fareed

Source: SBS



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आजकल चर्चा में हैं अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की हाल में रिलीज़ हुई फिल्म गुलाबो-सिताबो. इस फिल्म का लखनऊ से गहरा जुड़ाव है.


इस फिल्म की शूटिंग लखनऊ में ही हुई है और इसकी कहानी में भी लखनऊ दिखता है. यही नहीं, बहुत से स्थानीय कलाकारों जैसे फर्रुख जाफर, रेहान किदवई और जिया अहमद ने इसमें प्रभावशाली भूमिका निभाई है.


मुख्य बातें:

  • गुलाबो-सिताबो नाम अवध के कठपुतली मंचन से जुड़ा है. 
  • इतिहासकारों के मुताबिक गुलाबो-सिताबो का ज़िक्र मुग़ल बादशाहों पर लिखी किताबों में भी मिलता है. 
  • इन किरदारों के ज़रिए कठपुतली कलाकारों ने भारत सरकार के कई कार्यक्रमों के लिए जन-जागरण का काम किया है. 

इन सबके अलावा एक बात और है. वह है गुलाबो-सिताबो कठपुतली. गुलाबो-सिताबो कठपुतली का किरदार भी अवध की सरज़मीन का है. इसकी कहानी में ये समझिये कि दो महिलाएं हैं जो अपने पतियों को लेकर नोक-झोंक करती हैं और दर्शकों का मनोरंजन करती हैं. मजे की बात ये है कि इनकी लड़ाई में इनके पतियों को नहीं दिखाया जाता है.

गुलाबो-सिताबो कठपुतली का मंचन करने वाले लोग आपको आज भी लखनऊ में मिल जाएंगे. फिल्म में जो कठपुतली दिखाई गई है, वह भी लखनऊ के ही एक गुमनाम कठपुतली कलाकार नौशाद का मंचन है. लखनऊ में गोमती के किनारे बसे एक मोहल्ले में का नाम ही पुतली मोहल्ला है. यहां ये कठपुतली कलाकार रहते हैं. धीरे धीरे इनकी संख्या कम होती जा रही है क्यूंकि अब कठपुतली मंचन में उतना पैसा नहीं मिलता कि घर चल सके. 

इतिहासकारों की मानें तो गुलाबो-सिताबो कठपुतली का ज़िक्र मुग़ल बादशाहों पर लिखी किताबो में भी मिलता है. ये कठपुतली विधा के काल्पनिक किरदार है. इनके किस्से नवाबी दौर में में रचे बसे और चर्चित रहे हैं. नवाब वाजिद अली शाह के दौर में ये गुलाबो-सिताबो किरदार खूब प्रचलित हुए. आज भी पुराने लखनऊ में जब भी कहीं मोहल्ले में स्त्रियां बेसिर पैर की बातों पर लड़ती हैं तो लोग उनको गुलाबो-सिताबो कह देते हैं.

गुलाबो-सिताबो जहां लोगों का मनोरंजन करती हैं, वहीं कठपुतली कलाकार की उंगलियों पर नाचती भी हैं. लेकिन इनके कलाकारों का दर्द किसी से छुपा हुआ नहीं है. अब न रजवाड़े रहे और ना ही ज़मींदार. इनको प्रश्रय देने वाला कोई नहीं हैं. प्रदीपनाथ त्रिपाठी ऐसे ही एक कठपुतली कलाकार हैं. दशकों से वह इस विधा में काम कर रहे हैं. सरकार ने उन्हें पुरस्कारों से भी नवाजा है. आज भी छंद मुहावरों में ढली हुई पटकथा पर अपनी उंगली के इशारों पर कठपुतलियां नचा लेते हैं लेकिन दर्द उनका भी है. वह यूरोप तक गुलाबो-सिताबो का मंचन कर चुके हैं, मानव संसाधन मंत्रालय से इन पात्रों पर रिसर्च के लिए फेलोशिप भी इनको मिली है.

थोडा बहुत आसरा इन कलाकारों को भारत सरकार के साक्षर भारत कार्यक्रम से मिला जिसमें इन कठपुतली कलाकारों ने अपनी कला से जागरूकता फैलाई. उसमें भी गुलाबो-सिताबो का किरदार बहुत अहम रहा. आज अमिताभ बच्चन की फिल्म से कठपुतली कला की यादें फिर ताज़ा हो गयी हैं.

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