भारत, बिहार के बोधगया में महाबोधि मंदिर परिसर एक विश्व धरोहर स्थल है । वर्ष 2002 में यूनेस्को की ओर से इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया था। यह वह जगह है जो बौद्धों के लिए बहुत ही पूजनीय है क्योंकि, इसी स्थान पर बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। विश्वभर से सब धर्मों के लोग, मैडिटेशन करने और प्राचीन पर्यटन स्थलों को देखने के लिए बोधगया आते हैं।
भारत के पुरातत्व विभाग (Archaeological Survey of India) के अनुसार, सम्राट अशोक लगभग 260 B.C. में बोधगया आए थे और उन्होंने बोधि वृक्ष के पास एक छोटा मंदिर बनवाया था।

पहली-दूसरी सदी के एक शिलालेख में लिखा है कि अशोक के मंदिर की जगह एक नया मंदिर बनवाया गया था। वर्ड हैरिटेज कन्वेन्शन (World Heritage Convention ) के अनुसार, मौजूदा मंदिर 5वीं या 6वीं सदी का है।
यह पूरी तरह से ईंटों से बने सबसे पुराने बौद्ध मंदिरों में से एक है, जो गुप्त काल के आखिर से भारत में है।
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4.8 हेक्टेयर में फैले महाबोधि मंदिर परिसर में 55 मीटर ऊंचा भव्य मंदिर, वज्रासन, बोधि वृक्ष और बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के स्थल हैं, जो कई पुराने स्तूपों से घिरे हैं, और जिन्हें अच्छी तरह से सुरक्षित किया गया है।
महाबोधि मंदिर परिसर, बुद्ध के वहां बिताए समय से जुड़ी घटनाओं के संबंध में एक आर्कियोलॉजिकल महत्व की जगह है।
विश्व धरोहर स्थल की सूचि में शामिल करने के लिये , वर्ड हैरिटेज कन्वेन्शन द्वारा यह पक्का किया गया कि बुद्ध को इसी खास जगह पर ज्ञान मिला था जो सम्राट अशोक के समय से डॉक्यूमेंटेड या प्रमाणित है।
डिसक्लेमर - इस पॉडकास्ट में प्रस्तुत जानकारी Archaeological Survey of India तथा World Heritage Convention की वेबसाइटस् पर उपलब्ध सामग्री पर आधारित है।
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