मटियाले भूरे रंग के बालू के पत्थर से बनी यह दीदारगंज यक्षिणी की मूर्ति सीधी खड़ी हुई मुद्रा में एक स्त्री को दर्शाती है। इसका एक हाथ उपर कि ओर उठा है, जिसमे वह एक चामड को पकडे हुए है, जबकि दूसरा हाथ टूटा हुआ है। उपर का शरीर खुला है पर कमर के नीचे का भाग कपडे और आभूषण से ढका है। स्त्री शरीर के सौन्दर्य का यह उतम और प्रभावशाली प्रदर्शन है। ऐसा माना जाता है कि यह किसी स्त्री विशेष कि मूर्ति नहीं बल्कि नारी के शरीर के सौन्दर्य कि एक काल्पनिक प्रस्तुति है। चेहरे पर सुन्दरता के साथ शांति कि अभिव्यक्ति इसके प्रभाव को और बढाती है। कांसेप्ट शिवनाथ झा प्रस्तुतीकरण ; कुमुद मिरानी
मटियाले भूरे रंग के बालू के पत्थर से बनी यह दीदारगंज यक्षिणी की मूर्ति सीधी खड़ी हुई मुद्रा में एक स्त्री को दर्शाती है। इसका एक हाथ उपर कि ओर उठा है, जिसमे वह एक चामड को पकडे हुए है, जबकि दूसरा हाथ टूटा हुआ है। उपर का शरीर खुला है पर कमर के नीचे का भाग कपडे और आभूषण से ढका है। स्त्री शरीर के सौन्दर्य का यह उतम और प्रभावशाली प्रदर्शन है। ऐसा माना जाता है कि यह किसी स्त्री विशेष कि मूर्ति नहीं बल्कि नारी के शरीर के सौन्दर्य कि एक काल्पनिक प्रस्तुति है। चेहरे पर सुन्दरता के साथ शांति कि अभिव्यक्ति इसके प्रभाव को और बढाती है। कांसेप्ट शिवनाथ झा प्रस्तुतीकरण ; कुमुद मिरानी