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SBS Examines: अफवाह, नस्लवाद, और जनमत

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The referendum has made some Aboriginal and Torres Strait Islander people question their sense of belonging in Australia. Credit: Getty/Supplied

पिछले वर्ष जनमत यानी रेफेरेंडम के भ्रामक और जानकारी तेज़ी से फैलीं थीं। एक वर्ष बाद अब भी उनके असर महसूस किये जा सकते हैं।


Published

By Rachael Knowles

Presented by Vrishali Jain

Source: SBS




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पिछले वर्ष जनमत यानी रेफेरेंडम के भ्रामक और जानकारी तेज़ी से फैलीं थीं। एक वर्ष बाद अब भी उनके असर महसूस किये जा सकते हैं।


रेफेरेंडम अभियान के दौरान तागलका और गुमाज पुरुष कॉनर बोडेन ने वॉईस टू पार्लियामेंट से संबंधित शिक्षण वीडियो अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट करने शुरू किये थे।

उन्होंने पाया कि वे भ्रामक जानकारी की एक सतत धरा के विरुध्द लड़ रहे थे।

"बजाय के मैं लोगों को सीखा सकूं , या उन्हें ज्ञान दे सकूं, मैं लोगों को बोले गए झूठ से ही निपटता रह गया," वे बताते हैं।

रेफेरेंडम के दौरान एबोरिजिनल और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर लोगों के ख़िलाफ़ नस्लवाद बढ़ गया था जिससे समुदाय के कुछ लोग देश में अपनी जगह को लेकर अनिश्चित हो गे थे।

"मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि रेफेरेंडम के नतीजे के बाद समुदाय के कुछ हिस्सों में नस्लवाद, नस्ली नफरत, नस्ली अपमान से लड़ने की आज़ादी महसूस हुई है," एबोरिजिनल और टोरेस स्ट्रेट आइलैंडर सामाजिक न्याय कमिश्नर केटी किस कहती हैं।

एसबीएस एक्सामिन्स के इस अंश में जनमत के एक साल के बाद वॉइस टू पार्लियामेंट और उसकी विफलता में भ्रामक जानकारी के फैलाव की भूमिका पर विमर्श किया गया है।

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