वनी तो चली गई, उसके यादें बचा रही हैं लोगों की जान

Vani Kaushik

Source: Supplied

वनी कौशिक इस धरती पर सिर्फ 116 हफ्ते रही. इस दौरान उसने बहुत दर्द झेला. बहुत लड़ाई लड़ी. और फिर अपने माता-पिता निधि और विशाल कौशिक को छोड़कर इस दुनिया से चली गई. लेकिन आज भी वह इस धरती पर जानें बचा रही हैं. 9 जुलाई 2016 को इस धरती से जाने के बाद तीन साल में अब तक वनी सैकड़ों जानें बचा चुकी है.


दो साल की वनी कौशिक की जान 2016 में ल्युकेमिया के कारण चली गई थी. उसके माता-पिता निधि और विशाल के लिए यह जिंदगी थम जाने जैसा था. अपनी नन्ही बच्ची को उन्होंने संघर्ष करते देखा था.

आईटी प्रोफेशनल निधि बताती हैं, "उसके कैंसर का पता तब चला जब वह तीन महीने की थी. लेकिन पहले छह महीने के इलाज से ही वह ठीक होने लगी थी. डेढ़ साल तो सब ठीक रहा पर फिर कैंसर लौट आया. हम उसके भविष्य के सपने देखने लगे थे. पर उसके दूसरे जन्मदिन के करीब हमें पता चला कि कैंसर लौट आया है. संघर्ष फिर से शुरू हुआ. लेकिन इस बार यह सिर्फ तीन महीने चला. जिसके बाद वह हमें छोड़ गई."

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विशाल और निधि के लिए यहां से आगे बढ़ना आसान नहीं था. अपनी वनी को खोने के बाद उनके लिए सब रुक गया था. लेकिन वहां से एक रास्ता निकला जो उन्हें वनी के हौसले ने दिखाया.

निधि कहती हैं, "वनी बहुत मजबूत थी. कीमो थेरेपी के बाद इन बच्चों को लगातार खून की जरूरत होती है. अस्पताल में सबसे मुश्किल पल होते थे जब हम उसके लिए खून का इंतजार करते थे. तब उसका चेहरा एकदम मुरझा जाता था. लेकिन जैसे ही खून चढ़ाया जाता, वनी के चेहरे पर रौनक आ जाती. "

और उस रौनक को याद करते हुए निधि और विशाल ने फैसला किया कि वे दूसरों का जीवन बचाने की कोशिश करेंगे.

"जो कर सकते थे हमने किया लेकिन उसे बचा नहीं सके. लेकिन वनी के इलाज के दौरान हमें इस बात का अहसास हुआ कि रक्तदान कितना जरूरी है. हमने देखा है कि कैसे बच्चे एक एक यूनिट खून के लिए इंतजार करते हैं. जब सही ग्रुप वाला ब्लड नहीं मिलता है तो बहुत ज्यादा इंतजार करना पड़ता है. वनी के जाने के बाद हम सबको बताना चाहते हैं कि रक्तदान कितना जरूरी है, उन बच्चों के लिए जो कैंसर से लड़ रहे हैं. या फिर उनके लिए भी, जिनका एक्सिडेंट हो गया है. आपको पता भी नहीं है कि आप कहां किसकी जान बचा सकते हैं."

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इस भावना के साथ कौशिक दंपती पिछले दो साल से रक्तदान के लिए अभियान चला रहे हैं और अब तक सैकड़ों लोगों को प्रेरित कर चुके हैं. इसी साल अब तक 120 लोग इस अभियान के तहत रक्तदान कर चुके हैं.

विशाल बताते हैं, "हमने red25_Vanithesmilingstar नाम से एक ग्रुप बनाया है जिसके जरिए लोग रक्तदान कर सकते हैं. तो लोग जब रक्तदान के लिए जाते हैं तब वे इस ग्रुप के तहत रजिस्टर कर सकते हैं."

अब आर्मिडेल में रहने वाले विशाल और निधि की यह मुहिम तब और भी अहम हो जाती है जबकि ऑस्ट्रेलिया में उपलब्ध रक्त लगातार कम हो रहा है. रेड क्रॉस की एक रिपोर्ट बताती है कि इस हफ्ते ओ नेगेटिव ब्लड अपने न्यूनतम स्तर पर आ गया है. और पांच हजार नए रक्तदातातओं की फौरन जरूरत है.

पेशे से वैज्ञानिक विशाल कहते हैं कि अपनी बच्ची को तो वह नहीं बचा सके लेकिन इस मुहिम से उन्हें जरा सुकून मिलता है कि कई और बच्चों की जरूरत पूरी हो रही है.

वह कहते हैं, "वनी की कमी पूरी नहीं हो सकती. वह चली गई है. और जब उसकी याद आती है तो फिर कुछ भी अच्छा नहीं लगता. लेकिन इस अभियान से एक सुकून मिलता है. इस अभियान के जरिए वनी को याद करके एक सुकून मिलता है."

यह कहते कहते विशाल की आवाज भर्रा जाती है. वह माफी मांगकर चुप हो जाते हैं.


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