सोशल मीडिया कंपनियों को यहूदी-विरोध और सामाजिक एकजुटता पर बनी रॉयल कमीशन के सामने यह बताना पड़ा है कि वे अपने मंचों पर हानिकारक सामग्री को किस तरह नियंत्रित करती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि मामले की पूरी तस्वीर अब भी हमारे सामने नहीं है।
क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के डिजिटल मीडिया रिसर्च सेंटर के प्रोफेसर डेनियल एंगस ने SBS Examines को बताया कि सोशल मीडिया पर होने वाली ज़्यादातर सामग्री (content) की निगरानी और नियंत्रण पर्दे के पीछे होता है।
और ऑस्ट्रेलिया के मौजूदा कानूनों के तहत, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए नफ़रत भरी सामग्री (hateful content) को रोकना अनिवार्य नहीं है।
प्लेटफॉर्म्स को काफी हद तक वही करने की स्वतंत्रता है, जो वे चाहते हैं।प्रोफेसर डेनियल एंगस, निदेशक, डिजिटल मीडिया रिसर्च सेंटर, क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी
फ़ेडरल सरकार ने डिजिटल ड्यूटी ऑफ केयर को कानून का रूप देने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके तहत सोशल मीडिया कंपनियों की ज़िम्मेदारी होगी कि वे हानिकारक और नफ़रत भरे कंटेंट को फैलने से पहले ही रोकने के लिए कदम उठाएं।
लेकिन इस कानून पर अभी काम चल रहा है और रॉयल कमीशन को बताया गया है कि इसे लागू होने में अभी करीब दो साल लग सकते हैं।
इस हफ्ते के एपिसोड में SBS Examines का सवाल है-सोशल मीडिया पर नफ़रत भरी सामग्री को फैलने से रोकने की ज़िम्मेदारी आखिर किसकी है? और क्या इसे पूरी तरह रोका भी जा सकता है?
SBS Examines के इस अंश को SBS Punjabi के सहयोग से तैयार किया गया है।





