[म्यूजिक] नमस्कार! आप सुन रहे हैं एसबीएस हिंदी और मैं हूं शशि कुमार। ऑस्ट्रेलिया में बच्चों पर लगे सोशल मीडिया प्रतिबंध को लागू हुए एक महीने से ज्यादा हो चुके हैं। दुनिया में पहली बार किसी देश में बच्चों के सोशल मीडिया पर प्रतिबंध यहां लगाया गया था, जो कि ऑस्ट्रेलिया में स्कूल की छुट्टियों के साथ ही शुरू हुआ था। इस प्रतिबंध के असर को लेकर सरकार, सोशल मीडिया विशेषज्ञों और युवाओं की अलग अलग राय सामने आ रही है। साथ ही, क्या कहना है क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट का इस प्रतिबंध को लेकर? जानते हैं इस रिपोर्ट में।
...I am still on Snapchat, but I was banned from Instagram and TikTok.
Through the social media ban, I have only been banned off of Snapchat.
I'm still able to access some social medias like Snapchat and TikTok, but I am completely banned off Facebook and Messenger and Instagram.
ऑस्ट्रेलिया में दुनिया का पहला सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू हुए अब एक महीने से ज्यादा हो गया है और यह नई पाबंदियां स्कूल की छुट्टियों के दौरान लागू हुई थी।
They can spend a summer making real world connections with each other, with their siblings, with their parents. Skateboarding, writing, reading, art, music. I don't care what it is, but it's off the screen.
यह कहना है संचार मंत्री एनिका वेल्स का, जो बच्चों और युवाओं को सोशल मीडिया से हटकर नई गतिविधियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। सरकार के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में 8 से 15 वर्ष की आयु के लगभग ढाई मिलियन बच्चे हैं और इनमें से कई बच्चे एक से ज्यादा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन सरकार का कहना है कि अब तक करीब सैंतालीस लाख अकाउंट्स को निष्क्रिय किया गया है या बंद किया जा चुका है। तो सोशल मीडिया तक कम या बिना पहुंच के किशोर किशोरियां अपना समय कैसे बिता रहे हैं, इसे जानने के लिए एसबीएस ने सिडनी के उत्तर में स्थित एक स्काउट्स हॉल का दौरा किया।
I mean, I do like art. I do a lot of painting and so it's kind of given me more time to focus on that.
Today, for example, I'm going over to the beach to see some friends this afternoon, so definitely doing some more stuff off of my phone with some of my friends on, like out, like in the real world. [चuckles]
Um, I went to New Zealand for a camp, um, this just recently, and everyone was out and socializing and not on their phones, and it was seemed a bit more fun
यहां तक कि सोलह साल की मैडी, जो इस प्रतिबंध के दायरे में नहीं आती, वह भी बदलाव महसूस कर रही हैं।
I feel like everyone is a lot more chatty now, and there's less, like, checking phones in hangouts. And we've honestly been going out a lot more, like to the beach and to the shops and everything. It feels less draining to just be talking to them in person than online or like on Instagram.
ई सेफ्टी कमीशन के 2020 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, पहले बच्चे औसतन सप्ताह में करीब 14.4 घंटे ऑनलाइन बिताते थे। स्नैपचैट, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक सबसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म थे। सरकार का कहना है कि यह प्रतिबंध बच्चों को हानिकारक कंटेंट से बचाने और उनके मानसिक स्वास्थ्य और भलाई के लिए लगाया गया है। अब प्रतिबंध लागू हुए एक महीने से ज्यादा हो चुके हैं। क्या उनके व्यवहार, आदतों या मानसिक स्वास्थ्य में कोई बदलाव आया है? शैली, जो 14 साल के ट्रेविस की मां हैं, उनका कहना है-
The change, uh, has been great. He's just come back from a, a massive scout camp in New Zealand, uh, where previously on a scout camp before I did get messages quite a lot from him, where now it was like, "Are you still alive? I need proof of life." Uh, just because the kids weren't on their phones, uh, which was really cool, really good to see.
कुछ शोधों से पता चलता है कि सोशल मीडिया बच्चों और किशोर किशोरियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। पिछले साल जुलाई में जारी की गई ई सेफ्टी कमीशन की रिपोर्ट डिजिटल यूज एंड रिस्क के अनुसार, 10 से 15 साल के आधे से ज्यादा बच्चों ने साइबर बुलिंग का अनुभव किया है। लगभग हर चार में से एक बच्चे ने बिना सहमति के ट्रैकिंग, निगरानी या ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना किया है और लगभग उतने ही बच्चों ने ऑनलाइन यौन उत्पीड़न का भी अनुभव किया है। किड्स हेल्पलाइन के वर्चुअल सर्विसेज प्रमुख टोनी फिट्जगेराल्ड बताते हैं। कई युवाओं का ऐसा ही मानना है।
Oh, I think the standards on social media are really high, and because I'm only sixteen, like, seeing the standards of fully grown adults is really like altering my view of things, so that's been a lot better.
लेकिन हाल के दिनों में किए गए शोध से पता चलता है कि सोशल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध इतना सरल नहीं है। जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन पीडियाट्रिक्स के एक अध्ययन में, एक लाख से अधिक ऑस्ट्रेलियाई बच्चों के तीन साल के डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि सोशल मीडिया का सीमित मात्रा में उपयोग करने से बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य उन बच्चों की तुलना में बेहतर होता है, जो या तो सोशल मीडिया का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते हैं या फिर बहुत कम इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में प्रतिबंध के बाद...... चौदह वर्षीय एल्ना जैसी किशोरियों की चिंता है कि उनकी ऑनलाइन बनी दोस्तियां और समुदाय से उनका संपर्क टूट सकता है।
These connections that I have made from friends overseas and like making that scout camps and losing them is just, um, it's, it's hard because I can't communicate with them anymore, and I may not be able to see them at any other scout camps I go to.
किड्स हेल्पलाइन के टोनी फिट्जगेराल्ड कहते हैं कि यह बात खास तौर पर अति संवेदनशील बच्चों पर लागू होती है।
You know, young people have been have grown up, particularly, you know, in more recent years, have grown up as having social media as part of their lives. So it becomes a natural way of them maintaining connection with each other. Young people, particularly from vulnerable cohorts, um, who, uh, find it difficult to connect with others in more traditional senses, can find this as a really powerful way of connecting with others who've gone through similar experiences.
इससे यह सवाल उठता है कि यह प्रतिबंध कितना सफल रहा है और क्या यह अपने उद्देश्य को पूरा कर रहा है? क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के डिजिटल कल्चर एंड सोसाइटी सेंटर के निदेशक निकोलस कैराह कहते हैं।
Like, a really important part of our duty of care is actually a positive one, which is to say: what are we going to do to enable young people to connect, socialize, be creative with each other in the digital world? Because that is the world and that is their world now. You can't kind of exclude them from it until they're 16, um, and think, you know, we did the best thing for them. I just don't think we would have, because we would have, um, you know, done harmful things to their social world before they turn 16, and then they won't be very well prepared for what happens when it all switches on at 16.
सिडनी वेस्ट क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर फराह खान का कहना है।
सबसे पहले तो यह देखना जरूरी है कि जब भी कोई भी चेंज आता है, उसका पुशबैक होता ही होता है, क्योंकि बच्चे आदी नहीं थे। तो एक तरफ हम बच्चों को यह सिखा रहे हैं कि आपने इंडिपेंडेंट रहना है, आपने अपने डिसीजंस खुद लेने हैं, आपने अपनी चीजों को अपने प्लान खुद करना है और दूसरी तरफ हमने उनसे यह आजादी छीनी। तो उसका रिजल्ट क्या हो रहा है कि उनको यह फील होता जा रहा है कि हम शायद छोटी छोटी चीजों के लिए भी अपने पेरेंट्स पर दोबारा डिपेंडेंट हो रहे हैं। हमारी आजादी खत्म हो गई है, जिसके रिजल्ट में फिर वो या तो ज्यादा चिड़चिड़े हैं, बात नहीं कर रहे, नाराज ज्यादा रह रहे हैं, जहनी दबाव का शिकार हो रहे हैं या फिर गुस्से से बात कर रहे हैं, घर में खामोश रह रहे हैं। इस तरह के रिजल्ट्स देखने में आए।
डॉक्टर खान, बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर पेरेंट्स और कैरर को सलाह देते हुए कहती हैं।
तो जब हम बच्चों को स्क्रीन टाइम की तरफ बोलते हैं तो हमारी अब सारी बुक्स रिप्लेस होकर ई-बुक्स की तरफ चली गई हैं। हमारा सारा कोर्स टेक्नोलॉजी पर, आईपैड पर, लैपटॉप्स पर अवेलेबल है तो वह जरूरी है। लेकिन अगर हम खुद एज़ अ पेरेंट यह चेक एंड बैलेंस नहीं रखेंगे कि स्क्रीन टाइम जरूरत से ज्यादा हो रहा है और ऐसी चीजों में हो रहा है जो बच्चों की एजुकेशन के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि उनकी सिर्फ गेमिंग के लिए हो गया या दूसरे शोज़ के लिए हो गया तो वहां पर जाकर वह वैल्यू ऐड नहीं कर रहा। वह बच्चों को नुकसान पहुंचा रहा है। एक सेकंड में इतना स्क्रीन चेंज, कलर चेंज होता है जो बच्चों को जो उनकी अटेंशन में बहुत इंपैक्ट कर रहा है। वह फोकस सही नहीं कर पा रहे। चीजें याद नहीं रह रही हैं। बोर हो जाते हैं बहुत जल्दी। एक चीज में टिक के नहीं काम करते और एक टॉपिक से दूसरे टॉपिक पर जल्दी जल्दी जंप कर रहे हैं। तो स्क्रीन के नुकसान बहुत हैं। अगर वह लिमिट से ज्यादा इस्तेमाल करें तो।
सोशल मीडिया प्रतिबंध को लेकर डॉक्टर खान का कहना है।
तो सोशल मीडिया के बंद हो जाने से जाहिर है, जो सबसे बड़ा इंपैक्ट बच्चों की जहनी सेहत पर आया है, वह यही है कि वो जिन लोगों के साथ कनेक्टेड थे, वहां पर वो चीज उनको एक्सेस नहीं मिल रहा। लेकिन अगर आप उसके बरक्स दूसरा इंपॉर्टेंट एरिया देखिए तो उनको थोड़ा मुश्किल होगी, दिक्कत होगी शुरुआत में क्योंकि शुरुआत में कोई भी चेंज मुश्किल है। बट लेकिन उनको अब अपॉर्चुनिटी मिलेगी कि वो बाहर निकल के या तो स्पोर्ट्स में इन्वॉल्व हों, लाइब्रेरी जाकर अपने दोस्तों के साथ प्लान बनाएं, ग्रुप स्टडीज शुरू करें। फिजिकल कांटेक्ट बढ़ता है तो फिर आपकी सोशल स्किल्स बेहतर होती हैं। आपका इमोशनल, इमोशनल वेलबीइंग बेहतर होता है। आप बेहतर तरीके से बात कर सकते हैं। अब आज का बच्चा अगर मुस्तकीम स्क्रीन पर बैठा हुआ था, तो उसमें बात करने की सलाईयत नहीं रहती। वो आंख से आंख मिलाके कॉन्फिडेंटली अपने आप को नहीं बात कर पा रहा था। तो इसलिए ये सारे इंपैक्ट हैं। बट एट द सेम टाइम इसके फायदे भी हैं।
लेकिन फिलहाल ऑनलाइन कम समय बिताने से नई रूचियों और अनुभवों के दरवाजे खुल रहे हैं।
With hobbies, I have picked up, um, drawing a lot more than I used to. Like when I was younger, I used to draw a lot as I didn't have access to social media. But now that it's gone again, I've started drawing again.
END OF TRANSCRIPT