मुसलमानों में ट्रिपल तलाक का मुद्दा काफी सालो से बहस में छाया था. कल सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुना दिया. ट्रिपल तलाक का मामला इतना बढ़ गया था कि लोग एस एम् एस , फोन, मेल पर हजारो किलोमीटर दूर बैठे हुए एक झटके में तलाक दे रहे थे.
संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट इन इस प्रथा पर रोक लगा दी हैं. पांच अलग अलग धर्मो के जजों की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से ट्रिपल तलाक प्रथा पर रोक लगा दी. इस फैसले के बाद एक बार फिर बहस शुरू हो गयी और राजनीति भी.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित कई बड़े नेताओं ने इस मामले में ट्वीट कर के प्रतिक्रिया दी. मोदी ने इसे एतिहासिक फैसला बताया. उनके अनुसार इससे मुस्लिम महिलाओ में बराबरी का अधिकार मिलेगा.
लेकिन मुसलमानों में इस फैसले के बाद अजीब सी संशय की स्थिति है. शहरों में लोग फैसले से तो खुश दिखे लेकिन सबकी चिंता यही है कि कहीं इससे आगे चल कर कॉमन सिविल कोड न लागू कर दिया जाये. आम मुस्लिम खासकर महिलाएं इस फैसले से खुश हैं. ज़ाहिर है, एक झटके में तलाक तलाक तलाक कह देने से निकाह ख़त्म हो जाता और सबसे ज्यादा झेलना महिला को ही पड़ता है. अब ये खत्म हो गया.
इसकी ज़रूरत यूं पड़ी क्योंकि मुसलमानों में शादी को कोई सात जन्मों का रिश्ता नहीं माना जाता. उनके यहां शादी और निकाह सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट हैं. एक निकाहनामा होता है, जिसमें दोनों लड़का और लड़की निकाह को क़ुबूल कर के दस्तखत करते हैं, वकील और गवाहों की मौजूदगी रहती है. अब कॉन्ट्रैक्ट है तो उससे अलग होने का भी तरीका होना चाहिए. इसीलिए तलाक की ज़रूरत समझी गयी.
लेकिन एक झटके में ट्रिपल तलाक से निकाह ख़त्म कर देना काफी दिनों से बहस का मुद्दा बना हुआ था. कई मुस्लिम महिलाएं अदालत पहुंच गं और मामले में कोर्ट को फैसला देना पड़ा. अब एक झटके से तलाक नहीं होगी.
लखनऊ निवासी गृहिणी सय्यदा खतीजा कहती है, “इस ट्रिपल तलाक में शौहर जब चाहे तलाक दे सकता था. ऐसा नहीं होना चाहिए. तलाक देने का तरीका भी कुरान में हैं और उसमे कहीं एक झटके में तलाक देने को कहा गया है.”
शाइस्ता अम्बर जो ऑल इंडिया मुस्लिम विमिंज पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्षा हैं, उनके अनुसार ये फैसला काफी उम्मीद भरा है और इससे किसी को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए. अम्बर ने अपने इस बोर्ड का गठन पुराने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के विरोध में किया था.
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इस फैसले का स्वागत किया है. हालांकि बोर्ड के अनुसार इस फैसले में पर्सनल लॉ को कोर्ट ने संरक्षण दिया है. बोर्ड ने तुरंत एक प्रेस नोट जारी कर के कहा कि ये फैसला उसके लिए बहुत बड़ी जीत है क्योंकि इस फैसले ने एक बात साफ़ कर दी कि हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने की आज़ादी है और ये उसका मौलिक अधिकार है. बोर्ड ने ये भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सरकार द्वारा दुरुपयोग करके पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. बोर्ड ने इस मामले में 10 सितम्बर को भोपाल में विशेष बैठक बुलाई है.
बोर्ड के एग्जीक्यूटिव समिति के सदस्य और लीगल सेल के हेड ज़फरयाब जीलानी के अनुसार,” हम लोग शुरू से इस ट्रिपल तलाक जिसे तलाक ए बिद्दत कहते का विरोध करते रहे हैं और इसके खिलाफ आन्दोलन भी चलाये हैं. बाकी बातें हम पूरा फैसला पढने के बात ही करेंगे.”
हालांकि, निदा रहमान इस बात को नहीं मानतीं. उनके अनुसार, ये काम महिलाएं कब से बोर्ड से कह रही हैं कि एक बार में ट्रिपल तलाक गलत है. उन्होंने नहीं सुना. अब कह रहे हैं कि ये गलत है. कम से कम महिलाओं को राहत तो मिली जो घर बैठे तलाक का शिकार हो जाती थीं.
वैसे अब इस फैसले ने बोर्ड के किले में छोटा ही सही बदलाव का एक फाटक तो खोल ही दिया है.



