राजा रानी से मेरी दोस्ती, मेरे कॉफी ब्रेक्स के दौरान शुरू हुई थी. दफ्तर से जुड़ी एक कॉफी शॉप थी. उसके बाहर के ब्रांडे में सिगरेट पीने वालों के लिए कुछ मेजें लगी थीं जिन पर बाहर सड़क पर लगा पुराना दरख्त साया किया रहता था. मैं सिगरेट पीना छोड़ चुका था, उस वक्त से जब दिल पर बाई पास की स्टैंप लगी थी. लेकिन बाहर बैठे हुए दूसरों को सिगरेट पीते हुए देखना और फिजा में फैली तंबाकू के धुएं की हल्की बू अच्छी लगती थी.
मेरे आते ही राजा रानी भी मेरी मेज पर आकर बैठ जाते. उन्हें राजा रानी का नाम भी मैंने ही दिया था. शुरू में पता नहीं चला था कि राजा कौन है और रानी कौन. दोनों ही खूबसूरत रंगों के तोते थे. छोटे छोटे नाजुक से. रंगीन परों वाले. लेकिन फिर जरा गौर किया तो समझ में आ गया.
जिसका सर गहरे नीले रंग का था वो राजा था. जैसे नीले रंग की पगड़ी बांधे बैठा हो. और जिसका सिर गुलाबी था वो रानी थी जैसे सिर पर गुलाबी दुपट्टा ओढ़े बैठी शरमा रही हो.
मैंने कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि उनकी नस्ल क्या थी. जात पात क्या थी. ऑस्ट्रेलिया में इंसानों की तरह तोतों की भी एक मल्टिकल्चरल दुनिया आबाद थी. तीन सौ से ज्यादा नस्लों के तोते रहते थे. 57 तो ऐसे थे जो सिर्फ ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते थे. वो किसी भी नस्ल के थे मुझे अच्छे लगते थे.
वो ऊपर दरख्त की शाख पर पत्तों में छुपे बैठे मेरा इंतजार करते और मुझे देखते ही अपने रंगीन पर फड़फड़ाते हुए मेज पर आ जाते. मुझे लगता जैसे मेरे घर के आंगन में रेनबो उतर आया हो.
वो मेरी मेज पर चीनी खाने आते थे जो उनका सबसे पसंदीदा खाना था. वो मेरी मेज पर रखी हुई चीनी की सलाई जैसी पुड़िया अपनी चोंच से पकड़कर बाहर निकालते. मेज पर रखकर मार मार कर उनमें छेद करते और फिर चीनी के दाने चुगने लगते. पेट भर जाता तो वापस उड़कर पेड़ के घने पत्तों के बीच गुम हो जाते.
राजा रानी को सिगरेट पीने वालों की मेज पर जाना पसंद नहीं था. सिर्फ मैं था जो बगैर सिगरेट पिये मेज पर बैठता था. मेरा साथ कोई दूसरा भी नहीं होता था.
पहली बार मेरी मेज पर सिर्फ राजा उड़कर आया था. मेज के दूसरे किनारे पर पंजे टिकाये इधर उधर देखता रहा था. मुझसे उसे शायद दोस्ती की खुश्बू आई थी. इसलिए आहिस्ता आहिस्ता वो आगे बढ़ा और चीनी की पुड़िया चोंच से निकाल कर उसमें सुराख बनाने लगा था. उसी वक्त रानी भी आ गई. दोनों ने मिलकर जल्दी जल्दी चोंचे मारीं, चीनी खाई और उड़ गए.
राजा रानी से इस पहली मुलाकात के बाद मुझे उनकी और उन्हें मेरी आदत हो गई थी. जैसे ही मैं मेज पर आता, उड़कर आते और चीनी खाकर चले जाते. लेकिन एक दिन चीनी का क्राइसिस हो गया. कॉफी शॉप के मालिक ने कागज की पुड़िया की जगह शीशे वाले जार मेज पर रख दिये. राजा रानी आए तो चीनी नहीं थी. उन्होंने शीशे के जार पर चोंचे मारीं और मायूस होकर चले गए.
उसके बाद मैं बाहर से कागज वाले चीनी के पैक खरीदकर लाने लगा. राजा रानी खुश हो गए. चीनी खाने के बाद भी देर तक मेज पर बैठे गर्दनें हिलाते रहते. मैं एक हफ्ते के लिए गोल्ड कोस्ट गया तो कैफे के बाहर जीमीन पर, जहां सफाई करने वालों की पहुंच नहीं थी, वहां चीनी के बहुत से पैक छोड़ गया था.
राजा रानी से मेरी दोस्ती का ये सिलसिला एक जमाने तक चलता रहा. कलीग्स मेरा मजाक उड़ाते थे लेकिन मुझे परवाह नहीं थी. लेकिन एक दिन राजा रानी अचानक गायब हो गए. एक हफ्ते तक नजर नहीं आए.
मुझे उनकी बेवफाई पर गुस्सा आने लगा. शायद वो कहीं किसी और की मेज पर ज्यादा अच्छी चीनी खाने चले गए थे. मेरा ख्याल गलत था. एक दिन राजा अकेला आया और मेज के एक कोने पर पंजे गाड़कर बैठ गया, जिस तरह पहली बार आकर बैठा था. मैंने चीनी के पैक जेब से निकालकर मेज पर डाले लेकिन उसने नजर तक नहीं डाली.
बस आहिस्ता आहिस्ता चलता हुआ मेरी तरफ आया. और खामोश खड़ा रहा. मेरे दिल की एक धड़कन गुम हो गई.
क्या रानी उसे छोड़ गई? या मर गई थी?
शायद वो यही खबर मुझे देने आया था. वो कुछ देर इसी तरह खड़ा रहा फिर उड़कर चला गया. वो चीनी का पैक छुए बगैर छोड़ गया था.
मैं पैक मेज पर रखे आज भी उसका इंतजार करता हूं. लेकिन वो कभी वापस नहीं आया. उसकी स्वीटहार्ट उसे छोड़ गई थी. अब उसे चीनी नहीं खानी थी.
