भारतीय राष्ट्रगीत के 150 वर्ष: 'वन्दे मातरम्' की प्रतिबंध से देशभक्ति का प्रतीक बनने की यात्रा

150 Years Celebrations Of The National Song Vande Mataram/Getty

NCC Cadets perform during the 150 Years celebrations of the National Song Vande Mataram at India Gate Side on November 7, 2025, in New Delhi, India. Credit: Hindustan Times/Hindustan Times via Getty Images

भारत का राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम', जिसे मशहूर भारतीय लेखक बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था, पहली बार 7 नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन में छपा था। SBS हिंदी से बात करते हुए, कल्चरल हिस्टोरियन और यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूकासल से जुड़ी डॉ. सृष्टि गुहा ने उस गीत के सफ़र के बारे में बताया जिसने भारत के स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया और जो राष्ट्रीय गीत बन गया।


भारत के राष्ट्रीय गीत के 150 साल पूरे होने का जश्न मनाते हुए, डॉ. गुहा 1900 के दशक की शुरुआत की कुछ ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में बताती हैं, जिनकी वजह से अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।

डॉ. गुहा ने कहा, "प्रतिबंध से लोग रुके नहीं, इसके बजाय, इसने आंदोलन को और तेज़ और मज़बूत किया। इससे नारे और ज़्यादा लगने लगे। ज़्यादा लोगों ने इन शब्दों का बोलना शुरू कर दिया।"
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Dr Srishti Guha, a cultural historian with various research and teaching roles at the School of Humanities and Social Science, University of Newcastle and affiliated with the Purai Global Indigenous History Centre. Source: Supplied / Srishti Guha
डॉ. गुहा ने कहा, "यह सच में कमाल की बात है कि बंकिम बाबू के गुज़र जाने के बाद इस गाने ने आज़ादी के लिए लड़ने वालों को कैसे प्रेरित किया, कुछ ऐसा जिसकी उन्होंने उम्मीद भी नहीं की होगी।"

बंकिम चंद्र चटर्जी ने बंगाली और संस्कृत दोनों भाषाओं को मिलाकर यह गाना बनाया था। उन्होंने भारत को एक देवी माँ के रूप में दिखाया, एक ऐसी ताकतवर छवि जो बाद में राष्ट्रवादी आंदोलन का केंद्र बन गई।

उन्होंने इस गाने को अपने मशहूर नॉवेल आनंदमठ में भी शामिल किया। यह नॉवेल 1770 के बंगाल के भयानक अकाल और नवाबों और ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ़ संन्यासी विद्रोह की पृष्टभूमि पर आधारित है।
डॉ. गुहा ने 1905 में वंदे मातरम के शुरू होने से लेकर 1950 में संविधान सभा द्वारा इसे भारत का राष्ट्रीय गीत बनाए जाने तक के सफर का ब्यौरा दिया है।

डॉ. सृष्टि गुहा ने आगे कहा, “इसने न केवल अपने समय के स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय पहचान और सामूहिक भावना का एक स्थायी प्रतीक बना हुआ है।”
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