बिहार के 250 रुपये से सिडनी में 150 करोड़ तक की कहानी

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Amit Kumar Das Source: Supplied

सफलता के लिए क्या ज़रूरी है, एक डिग्री या कुछ कर गुजरने की ललक? अमित कुमार दास इस बात की मिसाल हैं कि अगर लगन हो तो बाकी सब चीज़ें अपने आप हो जाती हैं.


बिहार के अररिया जिले में पैदा हुए अमित आज ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में एक सफल बिजनसमैन हैं. कभी ढाई सौ रुपये ले कर दिल्ली जाने वाले अमित आज अपने जिले में 150 करोड़ से इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खोल रहे हैं.

अमित की कहानी कई साल पहले बिहार के अररिया जिले के एक गांव मिरदौल से शुरू होती हैं. गरीबी में पले अमित किसी तरह बारहवीं पास करते हैं और फिर शुरू होती है कमाने और जिंदा रहने की जंग. बहुत कुछ सोचा कि चलो गांव में मछली पालें, किसी तरह एक ट्रैक्टर ले कर कुछ करें. लेकिन हर काम में पैसे की कमी सामने आ जाती.

फिर वही किया, बिहार से पलायन. दिल्ली आए तो सोचा थोड़ा कंप्यूटर चलाना सीख लेंगे और छोटी मोटी नौकरी करके कुछ पैसे बचा लेंगे. तब अमित घर से किसी तरह 250 रुपये लेकर आए थे. लेकिन दिल्ली में कंप्यूटर इंस्टिट्यूट ने उन्हें दाखिला देने से ही इनकार कर दिया. वह बताते हैं, "हमें अंग्रेजी नहीं आती थी. वहां जो सवाल पूछे हमें समझ नहीं आए."

तब अमित ने एक इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स किया और फिर उसी कंप्यूटर इंस्टिट्यूट गए. इस बार दाखिला मिला और सीखने लगे. "फिर टेस्ट हुआ तो मेरे सबसे अच्छे नंबर आए. मुझे वहां नौकरी भी मिल गई. इसका बड़ा फायदा हुआ क्योंकि मेरे पास कंप्यूटर खरीदने के पैसे नहीं थे. तो वहां रहते हुए मैं अभ्यास करता रहा." फिर अमित को बेहतर नौकरी का ऑफर आया लेकिन उन्होंने मना कर दिया क्योंकि वह अपना काम करने का मन बना चुके थे.

किस्मत बदली, एक कॉन्फ्रेंस के सिलसिले में अमित सन 2008 में ऑस्ट्रेलिया आए. देश पसंद आया, काम करने के मौके दिखे और अमित ने फैसला किया ऑस्ट्रेलिया में ही कुछ करने का. लेकिन इसी बीच उनके पिता की मृत्य हो गई. अमित ने हिम्मत नहीं हारी और ऑस्ट्रेलिया में जम गए.

आज अमित ऑस्ट्रेलिया में ISOFT नाम से सॉफ्टवेयर कंपनी के मालिक हैं जिसका टर्नओवर 150 करोड़ रुपये है. लेकिन अभी भी अमित को बिहार में पटना से 300 किलोमीटर दूर अपने गांव की याद आती है. खुद इंजिनियर बनने की तमन्ना रही लेकिन न बन पाए तो उन्होंने दूसरों को इंजिनियर बनाने की सोची. आज उन्होंने अपने पैतृक स्थान पर अपने पिता की स्मृति में मोती बाबू इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलजी स्थापित किया है. वह कहते हैं, "मेरे पिता का निधन डॉक्टरी लापरवाही के कारण हुआ था. इसलिए मैं उनकी याद में एक अस्पताल बनाना चाहता हूं. अभी इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू किया है लेकिन मैं इसे यूनिवर्सिटी और मेडिकल कॉलेज तक लेकर जाना चाहता हूं."

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